यूपी के मेडिकल कॉलेजों में प्रोफेसरों के 75% से ज्यादा सीधी भर्ती वाले पद खाली, हाईकोर्ट ने मांगा जवाब
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सरकारी मेडिकल कॉलेजों में प्रोफेसरों की नियमित भर्ती नहीं होने पर नाराजगी जताई है। अदालत ने राज्य सरकार और लोक सेवा आयोग से 25 नवंबर तक जवाब मांगा है।
उत्तर प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में प्रोफेसरों के खाली पदों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने कहा कि नियमित पद खाली रखे जा रहे हैं और फिर काम चलाने के लिए संविदा पर नियुक्तियां की जा रही हैं। कोर्ट ने इस मामले में उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग (UPPSC) को भी पक्षकार बनाने की अनुमति दी है। साथ ही राज्य सरकार और आयोग से जवाब मांगा है।
न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ ने श्रीनिवासन गांधी की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया। मामले की अगली सुनवाई 25 नवंबर 2026 को होगी।
517 पद स्वीकृत, सीधी भर्ती के 82 पद खाली
सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में प्रोफेसरों के कुल 517 पद स्वीकृत हैं। इनमें 25 प्रतिशत पद सीधी भर्ती और 75 प्रतिशत पद पदोन्नति के जरिए भरे जाने हैं।
सीधी भर्ती के लिए निर्धारित 108 पदों में से केवल 26 पर ही नियुक्तियां हुई हैं। यानी इस श्रेणी के 82 पद खाली हैं। इस तरह सीधी भर्ती वाले 75 प्रतिशत से अधिक पदों पर अभी नियुक्ति नहीं हुई है।
सरकार की ओर से बताया गया कि 35 पदों पर भर्ती के लिए लोक सेवा आयोग को प्रस्ताव भेजा गया था, लेकिन उन पदों के लिए विज्ञापन जारी नहीं हुआ। याचिका दाखिल होने के बाद 18 अगस्त 2026 को 44 पदों पर भर्ती का विज्ञापन जारी किया गया। इसकी चयन प्रक्रिया अभी चल रही है।
संविदा कर्मचारियों के भरोसे चल रहे कई विभाग
अदालत ने सरकारी मेडिकल कॉलेजों में विभागों की स्थिति पर भी चिंता जताई। कोर्ट के सामने रखे गए विवरण के अनुसार, कई कॉलेजों में विभागाध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद संविदा पर काम कर रहे कर्मचारियों या असिस्टेंट और एसोसिएट प्रोफेसरों के पास हैं, जबकि उन विभागों में प्रोफेसर के पद स्वीकृत हैं।
अदालत ने टिप्पणी की कि नियमित पदों को खाली रखकर पहले कामकाज में कमी की स्थिति पैदा होती है और फिर उसे पूरा करने के लिए संविदा पर नियुक्तियां की जाती हैं। कोर्ट ने कहा कि मेडिकल कॉलेजों में जरूरी पदों को नियमों के अनुसार भरने के मुद्दे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
भर्ती बोर्ड का गठन नहीं होने पर भी सवाल
अदालत ने यह भी पाया कि 30 जनवरी 2026 को उत्तर प्रदेश विशेषज्ञ चिकित्सक एवं चिकित्सा शिक्षक भर्ती बोर्ड के गठन के लिए अधिसूचना जारी की गई थी, लेकिन इसके बावजूद बोर्ड का गठन नहीं हुआ। नियुक्तियों की जिम्मेदारी अभी भी लोक सेवा आयोग के पास है।
कोर्ट ने राज्य सरकार के जिम्मेदार अधिकारी से हलफनामा देकर बताने को कहा है कि भर्ती बोर्ड का गठन अब तक क्यों नहीं हुआ।
वहीं, लोक सेवा आयोग के सचिव को भी व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करना होगा। उन्हें 44 पदों की भर्ती की मौजूदा स्थिति, चयन प्रक्रिया पूरी होने की समय-सीमा और बाकी पदों का विज्ञापन जारी नहीं होने का कारण बताना होगा।
अदालत ने चेतावनी दी है कि अगली सुनवाई तक जरूरी हलफनामे दाखिल नहीं किए गए तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ उचित आदेश पारित किए जा सकते हैं।
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