यूपी में ग्राम प्रधानों का प्रशासक कार्यकाल बढ़ाने की तैयारी, शासन को भेजा गया प्रस्ताव
प्रदेश के 57,694 निवर्तमान ग्राम प्रधानों को छह महीने के लिए प्रशासक बनाया गया था। मौजूदा अवधि नवंबर के अंतिम सप्ताह में पूरी हो रही है। पंचायतीराज विभाग ने अगले छह महीने के विस्तार का प्रस्ताव भेजा है।
उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायत चुनाव में देरी के बीच निवर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में दी गई जिम्मेदारी आगे बढ़ाने की तैयारी है। पंचायतीराज विभाग ने प्रदेश के 57,694 ग्राम प्रधानों का प्रशासक के रूप में कार्यकाल अगले छह महीने बढ़ाने का प्रस्ताव शासन को भेजा है। अब इस पर अंतिम निर्णय राज्य सरकार को लेना है।
मई 2026 में ग्राम पंचायतों का पांच साल का कार्यकाल पूरा होने के बाद राज्य सरकार ने निवर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त किया था। यह व्यवस्था नई पंचायतों के गठन तक या अधिकतम छह महीने के लिए की गई थी। इसके तहत प्रदेश की 57,694 ग्राम पंचायतों में निवर्तमान प्रधानों को प्रशासनिक जिम्मेदारी सौंपी गई। अब यह अवधि नवंबर के अंतिम सप्ताह में समाप्त हो रही है। इसी को देखते हुए पंचायतीराज विभाग ने कार्यकाल बढ़ाने का प्रस्ताव भेजा है।
हाईकोर्ट ने तीन महीने में चुनाव कराने का दिया है निर्देश
ग्राम पंचायत चुनाव को लेकर 14 अक्टूबर 2026 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश दिया था। न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने राज्य निर्वाचन आयोग को उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव तीन महीने के भीतर पूरा कराने का निर्देश दिया था।
अदालत ने कहा था कि चुनाव की प्रक्रिया मौजूदा आरक्षण व्यवस्था के तहत पूरी की जाए। इसमें अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए निर्धारित 27 प्रतिशत आरक्षण भी शामिल रहेगा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग की जांच लंबित होने के आधार पर ओबीसी आरक्षित सीटों को सामान्य सीट नहीं माना जा सकता। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिलाओं के लिए लागू आरक्षण व्यवस्था भी जारी रहेगी।
हाईकोर्ट ने निवर्तमान ग्राम प्रधानों को प्रशासक नियुक्त करने के सरकार के 25 मई 2026 के आदेश को रद्द करने की मांग वाली याचिकाएं भी खारिज कर दी थीं। अदालत ने चुनाव होने तक अंतरिम प्रशासनिक व्यवस्था जारी रहने का रास्ता बरकरार रखा।
ओबीसी आयोग की रिपोर्ट का इंतजार
पंचायत चुनाव की तैयारियों में अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण का निर्धारण भी महत्वपूर्ण मुद्दा है। इसके लिए राज्य सरकार ने 20 जून 2026 को समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया था। आयोग को अपनी रिपोर्ट सौंपने के लिए छह महीने का समय दिया गया था, जो 20 नवंबर को पूरा हो रहा है।
6 नवंबर को प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, आयोग अब तक प्रदेश के 75 जिलों में से 52 जिलों का दौरा कर पाया है। शेष जिलों का अध्ययन और रिपोर्ट तैयार करने में आयोग को करीब तीन महीने अतिरिक्त लग सकते हैं। आयोग की ओर से अतिरिक्त समय मांगे जाने पर भी विचार किया जा रहा है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया था कि आयोग की जांच लंबित रहने के बावजूद चुनाव मौजूदा आरक्षण व्यवस्था के तहत कराए जाने चाहिए। ऐसे में आयोग की रिपोर्ट और चुनाव की समय-सीमा को लेकर सरकार के अगले कदम महत्वपूर्ण होंगे।
प्रशासकों के अधिकार सीमित
ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने की व्यवस्था में उनके अधिकार निर्वाचित प्रधानों जैसे पूर्ण नहीं हैं। सरकार की ओर से मई में जारी व्यवस्था के अनुसार, प्रशासक ग्राम पंचायतों के सामान्य और रोजमर्रा के कामकाज संभाल सकते हैं। उन्हें नीतिगत फैसले लेने की अनुमति नहीं है।
किसी विशेष या आपात स्थिति में नीतिगत निर्णय की आवश्यकता होने पर प्रस्ताव जिला पंचायत राज अधिकारी के माध्यम से जिलाधिकारी के पास भेजना होता है। जिलाधिकारी की मंजूरी के बाद ही ऐसा निर्णय लिया जा सकता है।
अब शासन के फैसले पर नजर
पंचायतीराज विभाग की ओर से छह महीने का कार्यकाल बढ़ाने का प्रस्ताव भेजे जाने के बाद अब शासन के निर्णय का इंतजार है। यदि प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है तो प्रदेश के 57,694 निवर्तमान ग्राम प्रधान प्रशासक के रूप में अपनी जिम्मेदारी आगे भी निभा सकेंगे। हालांकि, इस संबंध में अंतिम सरकारी आदेश जारी होने तक कार्यकाल विस्तार को मंजूर फैसला नहीं माना जा सकता।
दूसरी ओर, हाईकोर्ट के तीन महीने में चुनाव कराने के निर्देश के चलते राज्य सरकार और निर्वाचन आयोग के सामने निर्धारित समय में चुनाव प्रक्रिया पूरी करने की चुनौती भी है। ऐसे में आने वाले दिनों में शासन का निर्णय और चुनावी तैयारियों की प्रगति महत्वपूर्ण रहेगी।
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