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कानपुर देहात में दो नवजात मिले लावारिस, आखिर इन मासूमों का कसूर क्या?

कानपुर देहात के झींझक में बोरी में बंद नवजात मिलने के दो दिन बाद गजनेर में सड़क किनारे नवजात बच्ची मिली। दोनों घटनाओं ने बच्चों की सुरक्षा और संकट में फंसे परिवारों को मदद मिलने पर सवाल खड़े किए हैं।

कानपुर देहात में दो नवजात मिले लावारिस, आखिर इन मासूमों का कसूर क्या?

जिस मां की गोद में बच्चे की दुनिया बसती है, जिस आंचल की छांव में उसे सुरक्षा और सुकून मिलना चाहिए, उसी जीवन की शुरुआत अगर सड़क किनारे लावारिस हालत में हो तो इससे ज्यादा पीड़ादायक तस्वीर क्या होगी? जिस उम्र में एक मासूम को मां की छाती से लगकर दुनिया की पहली धड़कनें महसूस करनी चाहिए, उस उम्र में उसे अनजान रास्तों और दूसरों की मदद के भरोसे छोड़ दिया जा रहा है। इससे इससे मां बेटे के पवित्र रिश्ते को भी कलयुग की मां कलंकित कर रही है।

कानपुर देहात में नवजातों के साथ सामने आ रही घटनाएं इंसानियत को कठघरे में खड़ा कर रही हैं। झींझक में बोरी में बंद कर पेड़ से लटकाए गए नवजात की घटना का दर्द अभी कम भी नहीं हुआ था कि गजनेर में सड़क किनारे एक दुधमुंही बच्ची मिल गई। आखिर इन नन्हीं जिंदगियों का कसूर क्या है? जन्म लेते ही उन्हें सुरक्षा, अपनापन और ममता से दूर क्यों होना पड़ रहा है। यदि मासूम ममता नहीं देती तो क्या केवल हवस के लिए बच्चों को पैदा किया गया यह अब समाज के लिए प्रश्न चिन्ह बन गया है। मां बेटी व पुत्र के पवित्र रिश्ते को कलयुग की मां बार-बार कलंकित कर रही है। इससे इस पवित्र रिश्ते पर भी संकट के बादल दिख रहे हैं।

एक घटना का दर्द थमा नहीं, दूसरी ने झकझोरा

पिछले सप्ताह मंगलपुर क्षेत्र में एक नवजात बोरी में बंद पेड़ से लटका मिला था। बच्चे की आवाज सुनकर एक दूध व्यापारी ने प्रशासन को सूचना दी, जिसके बाद उसे मदद मिल सकी। यह घटना लोगों को झकझोरने के लिए काफी थी, लेकिन कुछ ही दिनों बाद 26 अक्टूबर को गजनेर थाना क्षेत्र के परिलोक गार्डन के पास सड़क किनारे एक नवजात बालिका मिलने की सूचना ने फिर चिंता बढ़ा दी। दो घटनाओं के बीच कम अंतर ने सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर बच्चों की सुरक्षा को लेकर समाज कितना संवेदनशील है और संकट में फंसे परिवारों तक सहायता पहुंचाने की व्यवस्था कितनी कारगर है।

राहगीर की सूचना पर पहुंची टीम, अस्पताल में भर्ती बच्ची

पुलिस के अनुसार, घाटमपुर के अरखरी निवासी प्रदीप चंद्र ने डायल-112 पर सूचना दी कि परिलोक गार्डन के पास सड़क किनारे एक नवजात बालिका पड़ी है। सूचना पर चाइल्ड हेल्पलाइन की टीम मौके पर पहुंची और बच्ची को संरक्षण में लेकर सीएचसी गजनेर पहुंचाया। प्राथमिक उपचार के बाद बाल कल्याण समिति के आदेश पर उसे बेहतर इलाज के लिए जिला अस्पताल के एसएनसीयू वार्ड में भर्ती कराया गया। फिलहाल बच्ची के परिजनों की तलाश की जा रही है। आखिर में इन नन्हीं जिंदगी का क्या दोष, जन्म के बाद 9 माह तक पेट में रखने वाली मां इसे सड़क किनारे क्यों फेंक कर गई यह चिंता का विषय है आखिर में यह नवजात बच्ची किससे अपने हिस्से का प्यार मांगेगी। एक चिंता का विषय है।

एक नवजात न अपनी पीड़ा शब्दों में बयां कर सकता है, न अपने साथ हुई किसी घटना का विरोध कर सकता है। उसे तो यह भी नहीं मालूम कि दुनिया में आने के बाद उसकी देखभाल कौन करेगा। उसके लिए मां का स्पर्श, परिवार का सहारा और सुरक्षित माहौल ही जीवन की पहली जरूरत होते हैं। ऐसे में किसी नवजात का असुरक्षित हालत में मिलना सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि समाज की संवेदनशीलता पर लगा गंभीर प्रश्नचिह्न है।लेकिन इन घटनाओं के पीछे की परिस्थितियां अभी स्पष्ट नहीं हैं। बच्ची को किसने और किन हालात में छोड़ा, यह जांच का विषय है। गरीबी, सामाजिक दबाव या पारिवारिक संकट जैसी संभावनाओं पर बिना प्रमाण किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। फिर भी, कोई परिवार यदि बच्चे का पालन-पोषण करने में असमर्थ है या किसी गंभीर संकट से गुजर रहा है, तो उसके लिए सुरक्षित और कानूनी सहायता के रास्ते उपलब्ध होने चाहिए।

सवाल सिर्फ छोड़ने वालों का नहीं, बचाने वाली व्यवस्था का भी

नवजातों को असुरक्षित छोड़ने की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए दोषियों की पहचान और नियमानुसार कार्रवाई के साथ बाल संरक्षण तंत्र को भी सक्रिय रहना होगा। लोगों को यह जानकारी मिलनी चाहिए कि संकट की स्थिति में कहां मदद मिलेगी और बच्चे की सुरक्षा के लिए कौन-से कानूनी विकल्प उपलब्ध हैं। बच्ची के परिजनों के संबंध में जानकारी रखने वाले लोग बाल कल्याण समिति, जिला प्रोबेशन कार्यालय या चाइल्ड हेल्पलाइन के टोल फ्री नंबर 1098 पर सूचना दे सकते हैं।

झींझक से गजनेर तक सामने आई घटनाएं एक कठोर सवाल छोड़ रही हैं—क्या किसी मासूम की जिंदगी की शुरुआत इतनी असुरक्षित होनी चाहिए? जन्म के बाद बच्चे को सुरक्षा देना केवल माता-पिता का ही नहीं, बल्कि समाज और व्यवस्था का भी दायित्व है। मां की ममता का कोई विकल्प नहीं, लेकिन जिन मासूमों को शुरुआती दौर में ही संरक्षण की जरूरत है, उन्हें सुरक्षित जीवन देना पूरे समाज की जिम्मेदारी है।

मासूमों के परिजनों की होनी चाहिए खोज और कार्रवाई

स्थानी लोगों की मांग इन दोनों घटनाओं ने मां के पवित्र रिश्ते को कलंकित कर दिया है वही पिता के अस्तित्व को भी खत्म कर रहा है ऐसे में समझ में गलत संदेश जा रहा है इसलिए इन दोनों घटनाओं के माता-पिता व परिजनों की खोज की जानी चाहिए और जिन लोगों ने यह घटना की है उनके खिलाफ प्रभावी कार्रवाई भी की जाए जिससे आगे भविष्य में इस तरह की घटनाओं पर अंकुश लगाया जा सके और यदि इस तरह की घटना का कहानी आशंका हो तो समय रहते उन परिवारों को मदद पहुंचाई जाए जिससे इस तरह के कार्य की पुनरावृत्ति न हो।

✓ संपादकीय जाँच: प्रूफ़रीडिंग DP Singh · प्रकाशन की मंज़ूरी DP Singh · हमारे मानक

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