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जब एक स्त्री अपनी पसंद भूल जाती है: जिम्मेदारियों के बीच खोती पहचान

परिवार की जरूरतों और रिश्तों को निभाते-निभाते कई महिलाएं अपनी इच्छाओं, पसंद और सपनों को पीछे छोड़ देती हैं। यह लेख उनकी अनकही भावनाओं और खुद से दोबारा जुड़ने की जरूरत पर बात करता है।

जब एक स्त्री अपनी पसंद भूल जाती है: जिम्मेदारियों के बीच खोती पहचान

उम्र का एक लंबा पड़ाव पार करते-करते न जाने कितनी स्त्रियाँ जिम्मेदारियों का बोझ अपने कंधों पर उठाए भीतर ही भीतर झुक जाती हैं। घर, परिवार, बच्चे, रिश्ते और अपेक्षाएँ निभाते-निभाते वे कब खुद से दूर हो जाती हैं, इसका एहसास उन्हें भी नहीं होता।

धीरे-धीरे दूसरों के लिए जीना उनकी आदत बन जाता है। परिवार की जरूरतें पूरी करना, सबकी पसंद का ख्याल रखना, हर किसी की परेशानी को अपनी परेशानी समझना और बिना शिकायत सब कुछ करते रहना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन जाता है।

मैं मानती हूँ कि घर-परिवार को संभालना हमारी जिम्मेदारी है। रिश्तों को निभाना भी जरूरी है। लेकिन क्या इस जिम्मेदारी का अर्थ यह है कि एक स्त्री खुद को पूरी तरह भुला दे? वह इतना क्यों खटती है कि जब जिम्मेदारियों का बोझ थोड़ा कम होता है, तो खालीपन उसे बेचैन करने लगता है? वह अपने लिए कुछ करने के बजाय फिर कोई नई जिम्मेदारी तलाशने लगती है।

मैं अक्सर मध्य आयु की महिलाओं से मिलती हूँ। उनकी जिंदगी आज भी परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है। पहले बच्चों की परवरिश, उनकी पढ़ाई और उनकी जरूरतें थीं, अब उन्हीं बच्चों के बच्चे उनकी दुनिया का हिस्सा बन चुके हैं।

वे घंटों रोटी के आकार और उसकी गोलाई पर बात कर सकती हैं। घर की सफाई, कपड़ों की धुलाई, रसोई के सामान और परिवार के हर सदस्य की पसंद-नापसंद पर बिना रुके बोल सकती हैं। लेकिन जब बात अपनी देखभाल की आती है, तो उनके पास समय नहीं होता। अपनी पसंद, अपने शौक और अपनी इच्छाओं के लिए उनके पास अक्सर कोई जवाब नहीं होता।

पहले मुझे लगता था कि शायद वे इसी जीवन में खुश हैं। अगर उन्हें अपने परिवार के लिए जीने में संतोष मिलता है, तो इसमें गलत क्या है? आखिर खुशी का हर व्यक्ति का अपना तरीका होता है।

लेकिन मेरा यह भ्रम तब टूटा, जब उन्हीं महिलाओं से अकेले में बातचीत हुई।

उनकी बातों में एक ऐसा संसार खुला, जो उनके हँसते हुए चेहरों के पीछे कहीं दबा हुआ था। वे कितनी सारी बातें अपने भीतर समेटे बैठी थीं। कितनी इच्छाएँ थीं, जिन्हें कभी शब्द नहीं मिले। कितनी शिकायतें थीं, जिन्हें उन्होंने कभी शिकायत समझकर भी व्यक्त नहीं किया।

एक महिला ने कहा कि पति के होते हुए भी उसने अपनी जिंदगी जैसे अकेले ही गुजार दी।

यह सुनकर मन भीतर तक आहत हुआ। साथ रहते हुए भी किसी का अकेला रह जाना कितना गहरा अनुभव होगा, इसे शायद वही समझ सकता है जिसने इस खालीपन को जिया हो।

मैंने उनसे उनकी पसंद के बारे में पूछा।

वह कुछ देर चुप रहीं। सोचती रहीं। फिर बोलीं कि शायद पहली बार किसी ने उनसे यह जानना चाहा है कि उन्हें क्या पसंद है।

उनकी अपनी पसंद क्या है, यह याद करने में भी उन्हें काफी वक्त लगा।

सोचिए, एक स्त्री जिसने पूरी जिंदगी परिवार के हर सदस्य की पसंद याद रखी, उसे अपने बारे में सोचने के लिए इतना वक्त क्यों चाहिए?

क्या उसने कभी अपनी पसंद को महत्व ही नहीं दिया? या फिर बार-बार दूसरों की इच्छाओं को प्राथमिकता देते-देते उसकी अपनी इच्छाएँ कहीं पीछे छूट गईं?

हम अक्सर महिलाओं के त्याग की प्रशंसा करते हैं। उन्हें परिवार की धुरी कहते हैं। उनके समर्पण को संस्कार और उनकी चुप्पी को समझदारी का नाम देते हैं। लेकिन शायद ही कभी यह पूछते हैं कि इस सबके बीच वह खुद कैसी है? उसे क्या अच्छा लगता है? वह क्या करना चाहती है? उसकी अपनी दुनिया में क्या बचा है?

परिवार के लिए जीना खूबसूरत है, लेकिन खुद को मिटा देना कोई अनिवार्यता नहीं होनी चाहिए।

एक स्त्री सिर्फ किसी की माँ, पत्नी, बहू या दादी नहीं होती। इन सभी रिश्तों से अलग उसकी अपनी भी एक पहचान होती है। उसकी भी पसंद होती है, सपने होते हैं, इच्छाएँ होती हैं और एक ऐसा समय भी होना चाहिए जो सिर्फ उसका हो।

मैं आज भी उस बातचीत को याद करती हूँ। और उस महिला के जवाब का इंतजार भी कर रही हूँ, जिसने अपनी पसंद याद करने के लिए कुछ पल नहीं, बल्कि एक लंबी खामोशी ली थी।

शायद अब उसे अपनी पसंद याद आ जाए।

क्योंकि कभी-कभी किसी स्त्री को बदलने की नहीं, बस खुद तक लौटने की जरूरत होती है।

और शायद किसी महिला से पूछा गया एक छोटा-सा सवाल—'तुम्हें क्या पसंद है?'—उसकी जिंदगी में खुद से दोबारा मिलने की शुरुआत बन सकता है।

✓ संपादकीय जाँच: प्रूफ़रीडिंग DP Singh · प्रकाशन की मंज़ूरी DP Singh · हमारे मानक

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