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संवैधानिक संस्थाओं पर प्रश्नचिन्ह: नकारात्मक राजनीति की पराकाष्ठा

सरकार की नीतियों का विरोध करना विपक्ष का अधिकार है, लेकिन चुनाव आयोग, न्यायपालिका और दूसरी संवैधानिक संस्थाओं पर सवाल उठाते समय तथ्यों और प्रमाणों का ध्यान रखना चाहिए।

संवैधानिक संस्थाओं पर प्रश्नचिन्ह: नकारात्मक राजनीति की पराकाष्ठा

लोकतंत्र की मजबूती केवल नियमित चुनावों और सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया में नहीं, बल्कि उसकी संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और विश्वसनीयता में निहित है। संसद, निर्वाचन आयोग, न्यायपालिका, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक तथा अन्य संवैधानिक संस्थाएँ लोकतांत्रिक व्यवस्था के ऐसे आधारस्तंभ हैं, जिनके माध्यम से सत्ता के अधिकारों को संवैधानिक मर्यादाओं में रखा जाता है और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित होती है। इन संस्थाओं की प्रतिष्ठा किसी राजनीतिक दल या सरकार की निजी उपलब्धि नहीं, बल्कि राष्ट्र की सामूहिक लोकतांत्रिक पूँजी है। इसलिए इनकी विश्वसनीयता को बनाए रखना सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों की समान जिम्मेदारी है।

लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। सरकार की नीतियों की आलोचना करना, उसकी विफलताओं को उजागर करना, जनहित के मुद्दों को उठाना और वैकल्पिक नीतिगत दृष्टिकोण प्रस्तुत करना विपक्ष का संवैधानिक एवं राजनीतिक दायित्व है। वास्तव में, एक सशक्त विपक्ष लोकतंत्र को अधिक उत्तरदायी बनाता है। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है, जब सरकार का विरोध करते-करते संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता और विश्वसनीयता को ही लगातार कठघरे में खड़ा किया जाने लगता है। राजनीतिक असहमति और संस्थागत अविश्वास के बीच एक स्पष्ट सीमा होती है। इस सीमा का उल्लंघन लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करता है।

समकालीन भारतीय राजनीति में यह प्रवृत्ति कई अवसरों पर देखने को मिली है कि जब किसी संवैधानिक संस्था का निर्णय किसी राजनीतिक दल की अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं होता, तब उसकी निष्पक्षता पर प्रश्न उठाए जाने लगते हैं। विशेषकर निर्वाचन आयोग के संदर्भ में चुनावी परिणामों के बाद राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का स्वरूप कई बार व्यापक संस्थागत अविश्वास तक पहुँच जाता है। निर्वाचन आयोग संविधान के अनुच्छेद 324 के अंतर्गत स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए उत्तरदायी है। उसकी कार्यप्रणाली की समीक्षा, मतदाता सूची की शुद्धता, मतदान प्रक्रिया की पारदर्शिता और चुनावी आचार संहिता के क्रियान्वयन पर प्रश्न उठाना पूरी तरह लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन चुनावी पराजय के बाद बिना पर्याप्त प्रमाण के पूरी चुनावी व्यवस्था को ही संदिग्ध बताना राजनीतिक आत्ममंथन से बचने का प्रयास भी हो सकता है।

किसी राजनीतिक दल की चुनावी सफलता या विफलता के पीछे अनेक कारण होते हैं। नेतृत्व की स्वीकार्यता, संगठनात्मक क्षमता, जनसंपर्क, नीतिगत स्पष्टता और जनता के बीच विश्वास जैसे तत्व चुनावी परिणामों को प्रभावित करते हैं। इसलिए प्रत्येक पराजय का दोष निर्वाचन आयोग या चुनावी प्रक्रिया पर डाल देना राजनीतिक विवेक का परिचायक नहीं हो सकता। यदि कहीं अनियमितता है तो उसके प्रमाण प्रस्तुत किए जाने चाहिए और संवैधानिक तथा न्यायिक प्रक्रियाओं के माध्यम से समाधान खोजा जाना चाहिए। संस्थाओं से जवाबदेही माँगना आवश्यक है, लेकिन उन्हें निराधार आरोपों के माध्यम से अविश्वसनीय बनाना उचित नहीं है।

यही स्थिति न्यायपालिका और जाँच एजेंसियों के संदर्भ में भी दिखाई देती है। न्यायपालिका भारतीय संविधान की संरक्षक है। केशवानंद भारती मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रतिपादित मूल संरचना का सिद्धांत भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका की ऐतिहासिक भूमिका को रेखांकित करता है। न्यायिक निर्णयों से असहमति हो सकती है और उनकी अकादमिक तथा संवैधानिक आलोचना भी होनी चाहिए। लेकिन किसी निर्णय को केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से देखकर न्यायिक स्वतंत्रता पर प्रश्नचिह्न लगाना उचित नहीं है। इसी प्रकार केंद्रीय जाँच एजेंसियों की कार्यप्रणाली में निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करना सरकार का दायित्व है। यदि इन एजेंसियों का राजनीतिक दुरुपयोग होता है तो उसकी आलोचना होनी चाहिए, लेकिन भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच को केवल राजनीतिक प्रतिशोध बताकर खारिज करना भी उचित नहीं है। प्रत्येक मामले का मूल्यांकन साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर होना चाहिए।

इस संदर्भ में विपक्ष की राजनीतिक जिम्मेदारी और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। लोकतंत्र में विपक्ष का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि उसने सरकार का कितना विरोध किया, बल्कि इस आधार पर होना चाहिए कि उसने देश के सामने कितने प्रभावी विकल्प प्रस्तुत किए। संसद में सार्थक बहस, जनहित के मुद्दों पर हस्तक्षेप, विधायी प्रक्रिया में भागीदारी और वैकल्पिक विकास दृष्टि प्रस्तुत करना विपक्ष की वास्तविक शक्ति है। यदि राजनीतिक दल अपनी अधिकांश ऊर्जा सरकार के प्रत्येक निर्णय को संदिग्ध बताने और संवैधानिक संस्थाओं पर आरोप लगाने में खर्च करते हैं, तो जनता के वास्तविक प्रश्न पीछे छूट जाते हैं। बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, आर्थिक विकास, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे विषयों पर गंभीर विमर्श की अपेक्षा जनता विपक्ष से करती है।

राजनीतिक विमर्श में सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने भी इस चुनौती को जटिल बनाया है। अधूरी सूचनाएँ, संदर्भहीन वीडियो और अपुष्ट आरोप कुछ ही समय में व्यापक स्तर पर प्रसारित हो जाते हैं। राजनीतिक दलों और उनके समर्थकों द्वारा किसी संस्थागत निर्णय को तत्काल राजनीतिक षड्यंत्र के रूप में प्रस्तुत करने से नागरिकों के बीच भ्रम और अविश्वास बढ़ता है। लोकतंत्र में नैरेटिव निर्माण स्वाभाविक है, लेकिन नैरेटिव तथ्यों का विकल्प नहीं हो सकता। राजनीतिक लाभ के लिए संस्थाओं की साख को कमजोर करना अंततः उसी लोकतांत्रिक व्यवस्था को नुकसान पहुँचाता है, जिसके माध्यम से राजनीतिक दल सत्ता प्राप्त करना चाहते हैं।

यह भी समझना आवश्यक है कि संवैधानिक संस्थाओं के प्रति सम्मान का अर्थ उन्हें आलोचना से परे मान लेना नहीं है। संस्थाएँ भी मानवीय व्यवस्था का हिस्सा हैं और उनकी कार्यप्रणाली में सुधार की आवश्यकता हो सकती है। नियुक्तियों में पारदर्शिता, प्रशासनिक स्वायत्तता, जवाबदेही और निर्णय प्रक्रिया की निष्पक्षता जैसे विषयों पर निरंतर चर्चा होनी चाहिए। लेकिन आलोचना का उद्देश्य सुधार होना चाहिए, संस्थाओं की वैधता को समाप्त करना नहीं। सरकार को भी विपक्ष की उचित आलोचना का सम्मान करना चाहिए और बहुमत के आधार पर असहमति की आवाज को दबाने से बचना चाहिए।

आज भारतीय लोकतंत्र को ऐसे विपक्ष की आवश्यकता है जो सरकार से कठिन प्रश्न पूछे, उसकी नीतियों की तथ्यपरक आलोचना करे और जनता के सामने विश्वसनीय विकल्प प्रस्तुत करे। साथ ही ऐसा सत्ता पक्ष भी आवश्यक है जो आलोचना को लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया माने और संस्थाओं की स्वतंत्रता को सर्वोच्च प्राथमिकता दे। लोकतंत्र में असहमति उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी शक्ति है। लेकिन असहमति जब निराधार अविश्वास और संस्थागत अवमानना में बदलने लगे, तब उस पर गंभीर विचार आवश्यक हो जाता है।

अंततः यह स्वीकार करना होगा कि संवैधानिक संस्थाएँ किसी राजनीतिक दल की नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र की साझा विरासत हैं। सरकारें बदलती हैं, राजनीतिक दलों की भूमिका बदलती है और सत्ता के समीकरण बदलते रहते हैं, लेकिन संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता बनी रहनी चाहिए। विपक्ष का विरोध लोकतंत्र की शक्ति है, किंतु संस्थाओं के प्रति निराधार अविश्वास उसकी कमजोरी बन सकता है। भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता इसी में है कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा जारी रहे, आलोचना निर्भीक हो, लेकिन संवैधानिक मर्यादा और राष्ट्रीय हित सर्वोपरि बने रहें।

✓ संपादकीय जाँच: प्रूफ़रीडिंग DP Singh · प्रकाशन की मंज़ूरी DP Singh · हमारे मानक

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