भारत वोकवाद की चुनौतियाँ
कभी सामाजिक अन्याय के प्रति जागरूकता से जुड़ा ‘वोक’ आज राजनीतिक ध्रुवीकरण का हिस्सा बन चुका है। भारत में इस बहस के बीच सवाल है कि सामाजिक न्याय, सांस्कृतिक परंपराओं और राष्ट्रीय एकता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
‘वोकवाद’ एक ऐसा शब्द बन गया है, जिसके अर्थ पर जितना विवाद है, उतना ही उसके राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव पर भी। विडंबना यह है कि जो शब्द कभी अन्याय के प्रति जागरूकता का प्रतीक था, वहीं आज राजनीतिक ध्रुवीकरण का पर्याय बन गया है। पश्चिमी देशों में दक्षिणपंथी राजनीति ने ‘वोक’ को प्रायः अतिरंजित राजनीतिक शुद्धतावाद, पहचान-आधारित राजनीति, ‘कैंसल कल्चर’ और परंपरागत मूल्यों के विरोध के अर्थ में इस्तेमाल करना शुरू किया।
1930 के दशक में अमेरिका में अफ्रीकी-अमेरिकी लोकगीतों और साहित्य में 'स्टे वोक' जैसे शब्दों का प्रयोग देखने को मिलता है। 1960 के दशक में सिविल राइट्स मूवमेंट (मार्टिन लूथर किंग जूनियर और मैल्कम एक्स आदि) के दौरान यह शब्द सामाजिक अन्याय के खिलाफ जागरूकता और सतर्कता का प्रतीक बन गया। ‘वोक’ होने का अर्थ था – नस्लवाद, पुलिस बर्बरता और सामाजिक असमानता के प्रति सजग रहना। मार्टिन लूथर किंग जूनियर और मैल्कम एक्स नागरिक अधिकार आंदोलन के दो प्रमुख नेता थे, लेकिन नस्लीय समानता हासिल करने के लिए उनके दृष्टिकोण अलग-अलग थे। किंग ने अहिंसक प्रतिरोध और एकीकरण की वकालत की, जबकि मैल्कम एक्स ने शुरू में अश्वेत अलगाववाद और आत्मरक्षा का समर्थन किया।
1980 और 1990 के दशकों में ‘क्रिटिकल रेस थ्योरी’, ‘उत्तर-आधुनिकतावाद’ और ‘इन्टर-सेक्शनलिटी’ जैसी अवधारणाओं ने वोकवाद की वैचारिक नींव को मजबूत किया। 2014 के ‘फर्ग्यूसन आंदोलन’ और ‘ब्लैक लाइफ मैटर’ के उभार के बाद ‘स्टे वोक’ व्यापक वैश्विक राजनीतिक शब्दावली का हिस्सा बना।
भारतीय संदर्भ में वोकवाद की वजह से कार्यस्थल पर लैंगिक भेदभाव, यौन उत्पीड़न, घरेलू हिंसा, वेतन असमानता, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और महिलाओं की शारीरिक स्वायत्तता जैसे प्रश्न आज केवल निजी जीवन के मुद्दे नहीं रह गए हैं। ‘मी टू’ जैसे वैश्विक आंदोलनों ने सत्ता और लैंगिक संबंधों की असमानताओं पर व्यापक बहस को जन्म दिया।
लेकिन वोकिज़्म धीरे-धीरे संस्कृति-परिवर्तन के एक नियोजित प्रोजेक्ट का अंग बनता जा रहा है। हमारी परंपराओं, धार्मिक प्रतीकों, इतिहास पुरुषों और लोकाचारों पर जिस प्रकार के प्रश्नचिह्न लगाए जा रहे हैं, वह किसी स्वाभाविक विमर्श का परिणाम नहीं, बल्कि एक प्रायोजित वैचारिक युद्ध का हिस्सा है। वोकवाद का मूल स्वरूप जागरूकता की आड़ में ऐतिहासिक अन्याय, लैंगिक असमानता, जातीय भेदभाव और सामुदायिक अधिकारों की चर्चा से जुड़ा है, किंतु भारत जैसे बहुलतावादी समाज में यह विमर्श अक्सर एकतरफ़ा नैरेटिव में बदल जाता है। यह विमर्श शिक्षा, मीडिया और सोशल मीडिया के माध्यम से प्रवेश कर रहा है, जहां समानता और न्याय की संकल्पनाएं कई बार सांस्कृतिक परंपरा और धर्मनिष्ठ मूल्यों के विरोध में खड़ी की जाती हैं।
दिल्ली में तथाकथित जेन-जी का विरोध-प्रदर्शन और उसमें शामिल युवाओं की कार्यशैली इस व्यापक वैचारिक संघर्ष को समझने के लिए महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। दिल्ली लंबे समय से छात्र आंदोलनों, नागरिक अधिकार आंदोलनों, महिला आंदोलनों और सामाजिक न्याय की राजनीति का प्रमुख केंद्र रही है। नागरिकता संशोधन कानून के विरोध से लेकर विश्वविद्यालय परिसरों के आंदोलनों तक राजधानी में ऐसे अनेक प्रदर्शन हुए जिनमें संविधान, नागरिक अधिकार, पहचान, समानता और राज्य की भूमिका पर प्रश्न उठे।
वोकवाद का सबसे गंभीर प्रश्न तब सामने आता है जब सामाजिक न्याय की राजनीति और राष्ट्रीय संप्रभुता के बीच संबंध पर विचार किया जाए। आलोचकों का तर्क है कि अत्यधिक पहचान-आधारित राजनीति राष्ट्रीय एकता को कमजोर कर सकती है। यदि नागरिक स्वयं को सबसे पहले जाति, नस्ल, धर्म, लिंग या अन्य पहचान के आधार पर देखने लगें और साझा नागरिकता की भावना कमजोर हो जाए, तो लोकतांत्रिक एकता के सामने चुनौती उत्पन्न हो सकती है। सोशल मीडिया के दौर में यह समस्या और गंभीर है, क्योंकि एल्गोरिदम अक्सर समान विचार वाले समूहों को एक-दूसरे के भीतर बंद कर देते हैं और ‘हम बनाम वे’ की मानसिकता को बढ़ाते हैं।
दूसरी ओर, यह भी ध्यान रखना होगा कि सामाजिक न्याय को राष्ट्रीय संप्रभुता का विरोधी मान लेना उचित नहीं है। एक लोकतांत्रिक राष्ट्र की संप्रभुता केवल उसकी सीमाओं और राज्य-सत्ता में नहीं, बल्कि नागरिकों के संवैधानिक विश्वास में भी निहित होती है। यदि किसी वर्ग को लगातार भेदभाव, अपमान या अवसरों से वंचित होने का अनुभव हो, तो राष्ट्रीय एकता की वास्तविक नींव कमजोर होती है। इसलिए समानता और न्याय को राष्ट्र-विरोधी विचार के रूप में देखना उतना ही खतरनाक है जितना कि पहचान की राजनीति को राष्ट्र की एकमात्र आधारशिला बना देना।
भारत के सामने वास्तविक चुनौती ‘वोक’ बनाम ‘एंटी-वोक’ का चुनाव नहीं है। चुनौती यह है कि सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय एकता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। इसके लिए हमें केवल तर्क और विचारों पर नहीं, बल्कि समाधान पर चिंतन करना पड़ेगा। संवैधानिक मूल्यों को वैचारिक ध्रुवीकरण से ऊपर रखना होगा। विश्वविद्यालयों और सार्वजनिक संस्थानों में असहमति के लिए स्थान सुरक्षित रखना होगा, लेकिन हिंसा, व्यक्तिगत और जातीय घृणा एवं अपमान को वैचारिक स्वतंत्रता का नाम नहीं दिया जा सकता। जाति और लैंगिक असमानता जैसे वास्तविक प्रश्नों पर तथ्य-आधारित नीतिगत हस्तक्षेप होना चाहिए। सोशल मीडिया पर ‘कैंसल कल्चर’ और डिजिटल भीड़तंत्र के बजाय तर्कपूर्ण संवाद को बढ़ावा देना होगा। भारतीय सामाजिक न्याय की अपनी परंपरा को पश्चिमी शब्दावली से स्वतंत्र रूप से पुनर्पाठ करना होगा।
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