सुप्रीम कोर्ट में प्रशांत भूषण और सिद्धार्थ दवे में तीखी बहस, सीजेआई बोले हम बस देख रहे है
सुप्रीम कोर्ट ने आशीष मिश्रा को 16 नवंबर तक लखीमपुर खीरी में परिवार के साथ रहने की अनुमति दी। सुनवाई के दौरान ट्रायल जज के तबादले पर वकीलों के बीच बहस भी हुई।
लखीमपुर खीरी हिंसा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा टेनी के बेटे आशीष मिश्रा को दिवाली पर अपने घर जाने की अनुमति दे दी है। अब वह अपने परिवार और करीबी रिश्तेदारों के साथ दिवाली मनाने के लिए लखीमपुर खीरी जा सकते हैं। अदालत ने उन्हें 16 नवंबर को वापस लौटने का निर्देश दिया है। हालांकि, उन्हें पहले से लागू जमानत की शर्तों का पालन करना होगा।
इस मामले की सुनवाई के दौरान एक और मुद्दा चर्चा में रहा। पीड़ितों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण और आशीष मिश्रा की ओर से पेश वरिष्ठ वकील सिद्धार्थ दवे के बीच ट्रायल जज के तबादले को लेकर बहस हुई। इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने साफ कहा कि अदालत किसी के खिलाफ कोई टिप्पणी नहीं कर रही है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुधार के लिए जो कदम उठाए हैं, वे पर्याप्त हैं।
सुनवाई में अदालत को यह भी बताया गया कि मामले में कुल 131 गवाह हैं, जिनमें से 90 की गवाही पूरी हो चुकी है और 41 गवाहों की गवाही बाकी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुकदमे की सुनवाई समय पर पूरी होनी चाहिए। न तो इतनी जल्दबाजी हो कि जरूरी सबूत और गवाह छूट जाएं और न ही इतनी देरी हो कि न्याय मिलने में अनावश्यक समय लगे।
सबसे पहले समझिए, लखीमपुर खीरी में क्या हुआ था?
यह मामला 3 अक्टूबर 2021 का है। उस समय उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के तिकुनिया इलाके में किसान प्रदर्शन कर रहे थे। किसान केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के विरोध में आंदोलन कर रहे थे।
इसी दौरान किसानों को गाड़ियों के काफिले ने कुचल दिया। इस हिंसा में कुल आठ लोगों की मौत हुई थी। इनमें चार किसान और एक पत्रकार शामिल थे। घटना के बाद भड़की हिंसा में एक वाहन चालक और दो बीजेपी कार्यकर्ताओं की भी जान गई थी।
इस मामले में पूर्व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी के बेटे आशीष मिश्रा मुख्य आरोपियों में शामिल हैं। उन पर किसानों को गाड़ी से कुचलने की घटना से जुड़े गंभीर आरोप हैं। मामले में उनके खिलाफ मुकदमा चल रहा है। ध्यान देने वाली बात यह है कि आरोपी होना और अदालत से दोषी ठहराया जाना अलग-अलग बातें हैं। इस मामले में अंतिम फैसला अभी आना बाकी है।
ट्रायल जज के तबादले पर वकीलों के बीच क्यों हुई बहस?
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान पीड़ित परिवारों की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने ट्रायल जज के तबादले का मुद्दा उठाया।
ट्रायल जज वह न्यायाधीश होता है, जो निचली अदालत में मामले की सुनवाई करता है, गवाहों के बयान सुनता है और सबूतों के आधार पर फैसला देता है।
प्रशांत भूषण ने कहा कि जज का फिलहाल केवल तबादला हुआ है और आगे भी कार्रवाई हो सकती है। उनका इशारा उस शिकायत और निगरानी रिपोर्ट की ओर था, जिस पर सुप्रीम कोर्ट पहले ही इलाहाबाद हाईकोर्ट को उचित कदम उठाने के लिए कह चुका था।
दूसरी ओर, आशीष मिश्रा के वकील सिद्धार्थ दवे ने कहा कि जज का तबादला सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत हुआ है। इसका यह अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए कि जज के खिलाफ कोई गलत निष्कर्ष निकाला गया है या उन पर किसी तरह का संदेह साबित हुआ है।
दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट किसी के खिलाफ कोई टिप्पणी नहीं कर रहा है। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट ने सुधार के लिए जो कदम उठाए हैं, वे पर्याप्त हैं।
इसका मतलब यह है कि अदालत ने जज के खिलाफ किसी आरोप को इस सुनवाई में सही या गलत घोषित नहीं किया। कोर्ट का ध्यान इस बात पर रहा कि हाईकोर्ट ने मामले में जरूरी प्रशासनिक कदम उठाए हैं और अब मुकदमे की सुनवाई आगे बढ़नी चाहिए।
मुकदमे में अब तक कितनी गवाही हुई?
सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पेश वकील रुचिरा गोयल ने अदालत को बताया कि मामले में विशेष सरकारी वकील यानी स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर (SPP) नियुक्त किया गया है।
उन्होंने बताया कि इस मुकदमे में कुल 131 गवाह हैं। इनमें से 90 गवाहों के बयान दर्ज हो चुके हैं, जबकि 41 गवाहों की गवाही अभी बाकी है।
यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी आपराधिक मुकदमे में गवाहों की गवाही और उनसे जिरह के बाद ही अदालत पूरे मामले के सबूतों का आकलन कर पाती है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि मुकदमे को समय पर पूरा करना जरूरी है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं होना चाहिए कि जल्दबाजी में किसी गवाह से ठीक से सवाल-जवाब न हो या कोई जरूरी सबूत छूट जाए।
अदालत का संदेश साफ था—न्याय मिलने में बेवजह देरी भी नहीं होनी चाहिए और मुकदमे की निष्पक्षता से समझौता भी नहीं होना चाहिए।
आशीष मिश्रा को दिवाली पर घर जाने की अनुमति क्यों मिली?
सुनवाई के दौरान आशीष मिश्रा की ओर से पेश वकील सिद्धार्थ दवे ने अदालत से अनुरोध किया कि उन्हें दिवाली मनाने के लिए एक सप्ताह तक लखीमपुर खीरी में अपने परिवार और करीबी रिश्तेदारों के साथ रहने की अनुमति दी जाए।
उन्होंने अदालत को बताया कि पहले भी त्योहारों के अवसर पर आशीष मिश्रा को इस तरह की छूट मिल चुकी है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह मांग स्वीकार कर ली। अदालत के आदेश के मुताबिक, आशीष मिश्रा दिवाली मनाने के लिए अपने गृह नगर लखीमपुर खीरी जा सकते हैं। उन्हें पहले से तय जमानत की शर्तों का पालन करना होगा और 16 नवंबर को वापस लौटना होगा।
यहां एक बात समझना जरूरी है। आशीष मिश्रा को पहले ही जमानत मिल चुकी है। अदालत ने अब केवल उनके घर जाने पर लगी पाबंदी में त्योहार के लिए सीमित छूट दी है। इसका मतलब यह नहीं है कि उन्हें मुकदमे से छुटकारा मिल गया है या उनके खिलाफ चल रही कानूनी कार्रवाई खत्म हो गई है।
क्या इस आदेश से मुकदमे पर कोई असर पड़ेगा?
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट का जोर मुकदमे को निष्पक्ष तरीके से आगे बढ़ाने और समय पर पूरा कराने पर है। अदालत ने गवाहों की संख्या, नए विशेष सरकारी वकील की नियुक्ति और ट्रायल जज के तबादले से जुड़े घटनाक्रम पर जानकारी ली।
आशीष मिश्रा को दिवाली पर घर जाने की अनुमति एक सीमित राहत है। इससे मुकदमे की सुनवाई पर रोक नहीं लगती और न ही आरोपों पर अदालत का अंतिम फैसला बदलता है।
लखीमपुर खीरी हिंसा में जिन लोगों की जान गई, उनके परिवारों को न्याय मिलने का इंतजार है। अब मुकदमे में 41 गवाहों की गवाही बाकी है। ऐसे में सबसे अहम सवाल यही है कि सुनवाई कितनी तेजी और निष्पक्षता से आगे बढ़ती है और अदालत कब इस मामले में अंतिम फैसला सुनाती है।
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