अमेरिका समेत दुनिया के बाजारों पर जियो की नजर, 12 साझेदारियों से 150 करोड़ यूजर्स तक पहुंचने का लक्ष्य
आकाश अंबानी ने जियो के ग्लोबल विस्तार की योजना बताई है। कंपनी अमेरिका, जर्मनी, पूर्वी एशिया, दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका में स्थानीय टेलीकॉम कंपनियों के साथ साझेदारी कर अपनी तकनीक पहुंचाना चाहती है।
भारत में सस्ते इंटरनेट और 4G-5G सेवाओं के जरिए बड़ा ग्राहक आधार बनाने के बाद अब रिलायंस जियो की नजर विदेशी बाजारों पर है। कंपनी चाहती है कि भारत में विकसित की गई उसकी टेलीकॉम तकनीक दूसरे देशों में भी इस्तेमाल हो। इसके लिए जियो सीधे हर देश में अपनी टेलीकॉम कंपनी खड़ी करने के बजाय वहां पहले से काम कर रही कंपनियों के साथ साझेदारी करने की योजना बना रही है।
जियो प्लेटफॉर्म्स के मैनेजिंग डायरेक्टर आकाश अंबानी ने 17 अक्टूबर को मुंबई में निवेशकों और ब्रोकरों के साथ बातचीत के दौरान कंपनी की इस योजना के बारे में संकेत दिए। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, जियो करीब 12 रणनीतिक साझेदारियां करने की संभावना देख रहा है। इनके जरिए कंपनी की तकनीक संभावित रूप से 150 करोड़ अतिरिक्त यूजर्स तक पहुंच सकती है।
यहां एक बात समझना जरूरी है। इसका मतलब यह नहीं है कि जियो इन सभी लोगों को सीधे अपने मोबाइल ग्राहक बना लेगा। कंपनी का मकसद अपनी तकनीक और डिजिटल सेवाओं को विदेशी टेलीकॉम कंपनियों के नेटवर्क और कारोबार में इस्तेमाल करने का अवसर तलाशना है। कितनी साझेदारियां होंगी और उनसे वास्तव में कितने यूजर्स तक पहुंच बनेगी, यह अभी भविष्य की बात है।
अमेरिका और जर्मनी में जियो को क्या अवसर दिख रहे हैं?
आमतौर पर माना जाता है कि नई टेक्नोलॉजी की सबसे ज्यादा जरूरत उन देशों को होती है जहां इंटरनेट और डिजिटल सुविधाएं अभी कमजोर हैं। लेकिन आकाश अंबानी का कहना है कि जियो के लिए अमेरिका और जर्मनी जैसे विकसित देशों में भी अवसर मौजूद हैं।
इन देशों में मोबाइल नेटवर्क और इंटरनेट की सुविधाएं पहले से काफी विकसित हैं। इसके बावजूद घरों तक हाई-स्पीड इंटरनेट पहुंचाने, फाइबर नेटवर्क का विस्तार करने और नेटवर्क को ज्यादा प्रभावी बनाने जैसे काम लगातार चलते रहते हैं।
यहीं जियो अपनी तकनीक के जरिए अवसर तलाशना चाहता है।
उदाहरण के लिए, किसी देश की टेलीकॉम कंपनी अपने ग्राहकों को बेहतर ब्रॉडबैंड सेवा देना चाहती है, लेकिन उसे नेटवर्क तैयार करने, उपकरणों को आपस में जोड़ने और पूरी व्यवस्था चलाने के लिए तकनीक चाहिए। ऐसी स्थिति में वह जियो के टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर सकती है।
इससे स्थानीय कंपनी को हर तकनीक नए सिरे से विकसित करने की जरूरत कम हो सकती है। दूसरी तरफ, जियो को भी दूसरे देश में शुरुआत से नेटवर्क और ग्राहक जुटाने की पूरी जिम्मेदारी नहीं उठानी पड़ेगी।
हालांकि, विदेशी कंपनियों के साथ साझेदारी करना आसान नहीं होगा। हर देश के नियम, सुरक्षा मानक, बाजार की जरूरतें और स्थानीय कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा अलग-अलग होती है। इसलिए जियो की योजना को सफल होने के लिए इन सभी पहलुओं पर काम करना होगा।
जियो अपनी कौन-सी तकनीक विदेश ले जाना चाहता है?
जियो की योजना सिर्फ मोबाइल इंटरनेट तक सीमित नहीं है। कंपनी ने भारत में अपना एक ऐसा टेक्नोलॉजी सिस्टम विकसित किया है, जिसमें नेटवर्क चलाने से लेकर ग्राहकों को डिजिटल सेवाएं देने तक कई हिस्से शामिल हैं।
इसमें 5G नेटवर्क की तकनीक, नेटवर्क मैनेजमेंट से जुड़े सॉफ्टवेयर और घरों तक ब्रॉडबैंड पहुंचाने वाली तकनीक शामिल हो सकती है।
जियो की होम ब्रॉडबैंड तकनीक भी इस योजना का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हर जगह फाइबर केबल बिछाना आसान नहीं होता। कहीं सड़कें खोदने की अनुमति लेना मुश्किल होता है, कहीं लागत ज्यादा आती है और कहीं नेटवर्क पहुंचाने में काफी समय लगता है। ऐसे इलाकों में वायरलेस तकनीक के जरिए घरों तक इंटरनेट पहुंचाने के विकल्प उपयोगी हो सकते हैं।
जियो भारत में अपने नेटवर्क को बड़े पैमाने पर चलाने का अनुभव दूसरे बाजारों में इस्तेमाल करना चाहता है। कंपनी का तर्क है कि तकनीक बनाना एक काम है, लेकिन उसे करोड़ों ग्राहकों के लिए लगातार और भरोसेमंद तरीके से चलाना अलग चुनौती है। भारत में बड़े स्तर पर काम करने का अनुभव जियो के लिए विदेशी बाजारों में उपयोगी हो सकता है।
लेकिन हर देश में भारत जैसा मॉडल काम करेगा, इसकी गारंटी नहीं है। विदेशी बाजारों में ग्राहकों की जरूरतें, इंटरनेट की कीमतें और पहले से मौजूद कंपनियों की ताकत अलग हो सकती है।
क्या जियो अमेरिका में अपनी टेलीकॉम कंपनी शुरू करेगा?
फिलहाल सामने आई जानकारी से ऐसा निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा। जियो की बताई गई योजना स्थानीय कंपनियों के साथ साझेदारी करके अपनी तकनीक उपलब्ध कराने की है। इसका मतलब यह नहीं है कि कंपनी अमेरिका में तुरंत मोबाइल सिम बेचने या अपने नाम से देशव्यापी नेटवर्क चलाने जा रही है।
इस मॉडल में स्थानीय टेलीकॉम कंपनी अपने ग्राहकों और बाजार के साथ बनी रह सकती है, जबकि जियो उसे नेटवर्क चलाने या ब्रॉडबैंड सेवा बेहतर बनाने के लिए तकनीकी समाधान दे सकता है।
इसे आसान उदाहरण से समझिए। अगर भारत की कोई कंपनी विदेश में अपना सॉफ्टवेयर इस्तेमाल करने के लिए दूसरी कंपनी को देती है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह वहां उसी नाम से पूरा कारोबार भी शुरू कर रही है। इसी तरह जियो अपनी तकनीक को अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहुंचाकर कमाई का रास्ता बना सकता है, भले ही ग्राहक सीधे जियो के नाम से सेवा न लें।
जियो के लिए यह मॉडल इसलिए भी अहम हो सकता है, क्योंकि विदेशी बाजारों में नेटवर्क खड़ा करने के लिए भारी निवेश की जरूरत पड़ सकती है। साझेदारी के जरिए कंपनी अपने तकनीकी अनुभव का इस्तेमाल कर सकती है, जबकि स्थानीय भागीदार बाजार की जरूरतों और नियमों को संभालने में मदद कर सकता है।
एलन मस्क और स्टारलिंक से विवाद का क्या संबंध है?
जियो के ग्लोबल विस्तार की चर्चा ऐसे समय में हो रही है, जब भारत में एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक की सेवाओं को लेकर भी बहस चल रही है। मस्क ने भारत में स्टारलिंक की व्यावसायिक शुरुआत में देरी को लेकर सवाल उठाए थे और आरोप लगाया था कि प्रभावशाली कारोबारी हित उसकी एंट्री में बाधा डाल रहे हैं। भारत सरकार ने नियामकीय प्रक्रिया में पक्षपात के आरोपों को खारिज किया है।
रिलायंस ने भी कहा है कि वह प्रतिस्पर्धा का स्वागत करती है और उसकी अपनी सैटेलाइट इंटरनेट सेवा को भी जरूरी मंजूरियों का इंतजार है।
यहां दोनों कारोबारों के बीच फर्क समझना जरूरी है। स्टारलिंक मुख्य रूप से सैटेलाइट के जरिए इंटरनेट उपलब्ध कराती है। वहीं जियो का नया अंतरराष्ट्रीय विस्तार प्रस्ताव व्यापक टेलीकॉम तकनीक, 5G और होम ब्रॉडबैंड से जुड़े प्लेटफॉर्म को विदेशी कंपनियों तक पहुंचाने पर केंद्रित है। रिलायंस की सैटेलाइट इंटरनेट योजना अलग विषय है।
इसलिए जियो की विदेशों में साझेदारी की योजना को सिर्फ स्टारलिंक के साथ मुकाबले के रूप में देखना अधूरा होगा। जियो का बड़ा लक्ष्य अपनी तकनीक को दूसरे देशों के डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर का हिस्सा बनाना है।
भारत के लिए यह योजना क्यों महत्वपूर्ण है?
अब तक भारत दुनिया की बड़ी टेक्नोलॉजी कंपनियों के लिए एक विशाल बाजार रहा है। यहां करोड़ों लोग मोबाइल इंटरनेट, डिजिटल पेमेंट, वीडियो स्ट्रीमिंग और ऑनलाइन सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं। जियो की योजना इस तस्वीर में एक नया पहलू जोड़ती है—भारत में विकसित तकनीक को दूसरे देशों में बेचने और इस्तेमाल कराने की कोशिश।
अगर विदेशी कंपनियां जियो के तकनीकी प्लेटफॉर्म को अपनाती हैं, तो इससे कंपनी के लिए कमाई का नया रास्ता खुल सकता है। भारत में विकसित तकनीक और उसे बड़े पैमाने पर चलाने का अनुभव अंतरराष्ट्रीय कारोबार का हिस्सा बन सकता है।
इससे भारतीय इंजीनियरों और तकनीकी विशेषज्ञों के काम को भी वैश्विक बाजार तक पहुंचाने का अवसर मिल सकता है। लेकिन इसका असर इस बात पर निर्भर करेगा कि जियो को कितने वास्तविक अनुबंध मिलते हैं, वे कितने बड़े होते हैं और कंपनी उन्हें लाभ के साथ चला पाती है या नहीं।
आगे क्या देखना होगा?
जियो ने करीब 12 रणनीतिक साझेदारियों और 150 करोड़ अतिरिक्त संभावित यूजर्स तक पहुंचने की बात कही है। अब सबसे अहम बात यह होगी कि कंपनी किन देशों में पहले कदम रखती है, किन स्थानीय ऑपरेटरों के साथ समझौते करती है और उसकी कौन-सी तकनीक वहां इस्तेमाल की जाती है।
यह भी देखना होगा कि इन साझेदारियों से जियो को कितनी कमाई होती है और विदेशी बाजारों में तकनीक को लागू करने की लागत कितनी आती है।
फिलहाल इसे जियो की अंतरराष्ट्रीय विस्तार योजना का स्पष्ट संकेत माना जा सकता है, लेकिन इसे विदेशी बाजारों में सफलता की गारंटी नहीं कहा जा सकता। जियो ने भारत में बड़े पैमाने पर नेटवर्क चलाने का अनुभव हासिल किया है। अब असली परीक्षा यह होगी कि क्या कंपनी इस अनुभव को अलग-अलग देशों की जरूरतों के हिसाब से ढालकर वैश्विक कारोबार में बदल पाती है।
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