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CEC को कानूनी छूट पर सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद महुआ मोइत्रा का हमला, सत्ता में आते ही ख़त्म करेंगे कानून

TMC सांसद महुआ मोइत्रा ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को कानूनी संरक्षण देने वाले प्रावधान पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि सत्ता में आने पर विपक्ष इस कानून को खत्म करने की पहल करेगा।

CEC को कानूनी छूट पर सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद महुआ मोइत्रा का हमला, सत्ता में आते ही ख़त्म करेंगे कानून

मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों को आधिकारिक कार्यों के दौरान किए गए कृत्यों के लिए कानूनी कार्रवाई से संरक्षण देने वाले प्रावधान पर सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सांसद महुआ मोइत्रा ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार और भाजपा को निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि इस कानून को पहले ही चुनौती दी जानी चाहिए थी और विपक्ष सत्ता में आने पर इसे समाप्त करने की पहल करेगा।

महुआ मोइत्रा की यह प्रतिक्रिया सुप्रीम कोर्ट की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को दिए गए कानूनी संरक्षण को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र सरकार तथा निर्वाचन आयोग से जवाब मांगे जाने के बाद आई है।

'CEC को विशेष कानूनी संरक्षण क्यों?'

महुआ मोइत्रा ने कहा कि राष्ट्रपति और मुख्य न्यायाधीश जैसे संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों को भी हर परिस्थिति में आजीवन कानूनी छूट नहीं मिली है। ऐसे में मुख्य चुनाव आयुक्त को इस तरह का विशेष संरक्षण दिए जाने का औचित्य क्या है?

उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का नाम लेते हुए सवाल उठाया कि उन्हें ऐसा संरक्षण क्यों दिया गया है। मोइत्रा ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार को आशंका है कि भविष्य में सत्ता बदलने पर नए शासन में इस कानून को लेकर जवाबदेही तय करने की मांग उठ सकती है।

संसद में कानून खत्म करने की कही बात

TMC सांसद ने दावा किया कि यह कानून उस समय पारित किया गया था, जब संसद से 150 सांसद निलंबित थे। उन्होंने कहा कि ऐसे कानून संसद में बहुमत के आधार पर बनाए जाते हैं और यदि भविष्य में विपक्ष को बहुमत मिलता है तो इस प्रावधान को समाप्त करने की दिशा में सबसे पहले कदम उठाया जाएगा। मोइत्रा ने यह भी कहा कि उनकी पार्टी और विपक्ष ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित करने की कोशिश करेंगे। उनके बयान में उन्हें जेल भेजने की बात भी शामिल थी।

क्या है कानूनी प्रावधान?

विवाद का केंद्र मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 16 है। इस प्रावधान के तहत किसी वर्तमान या पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त अथवा निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ उनके आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किए गए किसी कार्य, कथन या गतिविधि के संबंध में दीवानी या आपराधिक कार्यवाही शुरू करने या जारी रखने पर रोक लगाई गई है।

इस प्रावधान को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह संरक्षण अत्यधिक व्यापक है और संवैधानिक जवाबदेही तथा नागरिकों के कानूनी उपचार के अधिकार को प्रभावित कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और निर्वाचन आयोग से मांगा जवाब

4 नवंबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस प्रावधान की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केंद्र सरकार और निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। याचिकाओं में धारा 16 को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है।

यह मामला पहले से लंबित याचिकाओं के साथ जोड़ा गया है। रिपोर्टों के अनुसार, अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 18 दिसंबर 2026 के लिए निर्धारित की है।

सुप्रीम कोर्ट की ओर से नोटिस जारी होने का अर्थ यह नहीं है कि अदालत ने कानून को असंवैधानिक घोषित कर दिया है। फिलहाल धारा 16 लागू है और इसकी वैधता पर अंतिम फैसला आना बाकी है।

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