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वेदांता-रव्वा ऑयल मध्यस्थता मामले में सुप्रीम कोर्ट की केंद्र को नसीहत, सरकार की अपील खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने 2004 और 2016 के विदेशी मध्यस्थता फैसलों को लागू करने के मामले में केंद्र सरकार की चुनौती खारिज कर दी। पीठ ने कहा कि ऐसे फैसलों के क्रियान्वयन में लंबे समय तक कानूनी अड़चनें भारत की मध्यस्थता व्यवस्था पर भरोसा कमजोर कर सकती हैं।

वेदांता-रव्वा ऑयल मध्यस्थता मामले में सुप्रीम कोर्ट की केंद्र को नसीहत, सरकार की अपील खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार, 2 नवंबर को वेदांता लिमिटेड और रव्वा ऑयल (सिंगापुर) प्राइवेट लिमिटेड के पक्ष में आए दो विदेशी मध्यस्थता फैसलों के क्रियान्वयन को लेकर केंद्र सरकार की अपील खारिज कर दी। अदालत ने मध्यस्थता के फैसलों को लागू करने की प्रक्रिया में लंबे समय तक कानूनी अड़चनें पैदा होने पर सवाल उठाए और कहा कि इस तरह की कार्यवाही से भारत की मध्यस्थता व्यवस्था में अंतरराष्ट्रीय भरोसा प्रभावित हो सकता है।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनमोहन की पीठ दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को चुनौती देने वाली केंद्र सरकार की याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें वेदांता और रव्वा ऑयल के पक्ष में आए 2004 और 2016 के विदेशी मध्यस्थता फैसलों को भारत में लागू करने की अनुमति दी गई थी।

लाइव लॉ और अन्य कानूनी रिपोर्टों के अनुसार, सुनवाई के दौरान पीठ ने सरकार की ओर से फैसलों के क्रियान्वयन का विरोध किए जाने पर सवाल उठाए। अदालत ने इस बात पर चिंता जताई कि जब मध्यस्थता को विवादों के समाधान का प्रभावी माध्यम बनाने की बात की जाती है, तब विदेशी मध्यस्थता फैसलों को लागू करने की प्रक्रिया वर्षों तक कानूनी विवादों में क्यों उलझी रहती है।

1994 के अनुबंध से शुरू हुआ था विवाद

यह विवाद वर्ष 1994 में केंद्र सरकार और रव्वा तेल एवं गैस क्षेत्र के विकास से जुड़े एक कंसोर्टियम के बीच हुए प्रोडक्शन शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट (PSC) से जुड़ा है। इस परियोजना में ONGC, रव्वा ऑयल, वीडियोकॉन और केयर्न से जुड़ी कंपनियां शामिल थीं। बाद में केयर्न इंडिया का वेदांता में विलय हो गया।

विवाद मुख्य रूप से इस बात को लेकर था कि तेल उत्पादन से होने वाले मुनाफे में सरकार की हिस्सेदारी की गणना करते समय ONGC की कुछ लागतों और भुगतान को किस तरह शामिल किया जाए। इस मुद्दे को मध्यस्थता के लिए भेजा गया था, जिसकी सुनवाई कुआलालंपुर में हुई।

2004 में आंशिक और 2016 में अंतिम फैसला

मध्यस्थता न्यायाधिकरण ने अक्टूबर 2004 में आंशिक फैसला सुनाया था। इसमें विवाद के कुछ मुद्दों पर कंपनियों के पक्ष में निर्णय दिया गया, जबकि संबंधित राशि के अंतिम निर्धारण का प्रश्न बाद के लिए छोड़ा गया था।

इसके बाद जुलाई 2014 में केंद्र सरकार ने कंपनियों को कारण बताओ नोटिस जारी किए और करीब 99 मिलियन अमेरिकी डॉलर की राशि की वसूली का मुद्दा उठाया। इसके बाद लंबित राशि के निर्धारण के लिए मामला फिर मध्यस्थता न्यायाधिकरण के सामने गया। न्यायाधिकरण ने अक्टूबर 2016 में अंतिम फैसला सुनाया।

इन फैसलों को मलेशिया की अदालतों में भी चुनौती दी गई थी। वहां की अदालतों से फैसलों को बरकरार रखे जाने के बाद वेदांता और रव्वा ऑयल ने भारत में उनके क्रियान्वयन के लिए दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया।

केंद्र सरकार ने किन आधारों पर दी थी चुनौती?

केंद्र सरकार ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए विदेशी मध्यस्थता फैसलों के क्रियान्वयन पर आपत्ति जताई थी। सरकार की ओर से समय-सीमा, मध्यस्थता न्यायाधिकरण के अधिकार क्षेत्र और सार्वजनिक नीति से जुड़े कानूनी आधार उठाए गए थे।

दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकार की आपत्तियों को स्वीकार नहीं किया और 1 जुलाई 2026 के फैसले में विदेशी मध्यस्थता निर्णयों को लागू करने की अनुमति दी। इसके बाद केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के बाद हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने का आधार नहीं पाया और केंद्र की अपील खारिज कर दी। इससे वेदांता और रव्वा ऑयल के पक्ष में आए मध्यस्थता फैसलों के भारत में क्रियान्वयन का रास्ता बरकरार रहा।

भारत की मध्यस्थता व्यवस्था के लिए क्या है इसका महत्व?

इस मामले का महत्व केवल दो कंपनियों और केंद्र सरकार के बीच पुराने कारोबारी विवाद तक सीमित नहीं है। विदेशी निवेश और अंतरराष्ट्रीय व्यापार से जुड़े अनुबंधों में मध्यस्थता को विवाद समाधान का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है।

ऐसे मामलों में मध्यस्थता न्यायाधिकरण के फैसलों को लागू करने में लंबी कानूनी प्रक्रिया निवेशकों और कारोबारी संस्थाओं के भरोसे को प्रभावित कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी इसी व्यापक संदर्भ में महत्वपूर्ण है।

✓ संपादकीय जाँच: प्रूफ़रीडिंग DP Singh · प्रकाशन की मंज़ूरी DP Singh · हमारे मानक

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