दिल्ली के प्रदूषण पर पंजाब के मंत्री का BJP से सवाल, केजरीवाल के पुराने बयान भी चर्चा में
हरपाल सिंह चीमा ने पूछा कि पंजाब से करीब 300 किलोमीटर दूर दिल्ली तक पहुंचने वाले प्रदूषण के लिए केवल पंजाब को जिम्मेदार कैसे ठहराया जा सकता है। हालांकि, दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी अपने कार्यकाल में पराली जलाने को प्रदूषण का बड़ा कारण बता चुके हैं।
दिल्ली में बढ़ते वायु प्रदूषण को लेकर पंजाब और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। पंजाब के वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा ने भाजपा पर पंजाब के किसानों को निशाना बनाने का आरोप लगाते हुए सवाल किया है कि पंजाब से दिल्ली की दूरी करीब 300 किलोमीटर है और बीच में पूरा हरियाणा पड़ता है, फिर दिल्ली के प्रदूषण के लिए केवल पंजाब को जिम्मेदार क्यों ठहराया जा रहा है?
चीमा ने कहा कि क्या पराली का धुआं ट्रकों या बसों में भरकर दिल्ली पहुंचाया जा रहा है? उनके मुताबिक, हरियाणा में प्रदूषण को लेकर वैसी चर्चा नहीं की जाती, जैसी दिल्ली के प्रदूषण के मामले में पंजाब को लेकर होती है। उन्होंने भाजपा पर आम आदमी पार्टी (AAP) की पंजाब सरकार के खिलाफ निराधार आरोप लगाने का भी आरोप लगाया।
चीमा का यह बयान ऐसे समय आया है, जब दिल्ली की हवा की गुणवत्ता नवंबर की शुरुआत में तेजी से बिगड़ी है और पराली जलाने के मुद्दे पर भाजपा तथा आम आदमी पार्टी के बीच आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं।
केजरीवाल मुख्यमंत्री थे, तब पंजाब और हरियाणा की पराली को बताया था प्रदूषण की वजह
दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल के पुराने बयान इस राजनीतिक बहस को एक अलग संदर्भ देते हैं।
5 नवंबर 2016 को दिल्ली के मुख्यमंत्री रहते हुए केजरीवाल ने कहा था कि पंजाब और हरियाणा के खेतों में बड़े पैमाने पर पराली जलाने से दिल्ली में धुंध और प्रदूषण बढ़ रहा है। उन्होंने उस समय इसे प्रदूषण का सबसे बड़ा संभावित कारण बताया था और केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की मांग की थी।
9 नवंबर 2017 को भी उन्होंने पंजाब और हरियाणा के मुख्यमंत्रियों से पराली जलाने की समस्या पर बातचीत करने की अपील की थी। उनका कहना था कि दोनों राज्यों के किसानों को पराली के प्रबंधन के लिए पर्याप्त विकल्प उपलब्ध कराने की जरूरत है।
1 नवंबर 2018 को केजरीवाल ने चंडीगढ़ में मीडिया से बातचीत के दौरान पंजाब में पराली जलाने को दिल्ली के बढ़ते प्रदूषण का एकमात्र कारण बताया था। उन्होंने इस संबंध में सैटेलाइट तस्वीर भी दिखाई थी और कहा था कि पंजाब के कई इलाकों में पराली जलाने की घटनाएं हो रही हैं। उस समय उन्होंने दिल्ली के यातायात और उद्योगों को प्रदूषण बढ़ने की मुख्य वजह मानने वाले तर्कों को भी खारिज किया था।
17 अक्टूबर 2021 को दिल्ली की हवा बेहद खराब श्रेणी में पहुंचने के बाद केजरीवाल ने फिर पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में पराली जलाने को प्रदूषण बढ़ने की वजह बताया था। हालांकि, उसी बयान में उन्होंने दिल्ली के स्थानीय प्रदूषण स्रोतों के रूप में वाहनों और धूल का भी उल्लेख किया था।
इस तरह केजरीवाल के पुराने बयानों से स्पष्ट है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने पराली जलाने को दिल्ली के मौसमी प्रदूषण का महत्वपूर्ण कारण माना था और इसके लिए पड़ोसी राज्यों की सरकारों से कार्रवाई की मांग की थी।
आंकड़े क्या बताते हैं: पराली का योगदान हर दिन एक जैसा नहीं
दिल्ली के प्रदूषण में पराली जलाने की हिस्सेदारी को लेकर उपलब्ध सरकारी और वैज्ञानिक आंकड़े बताते हैं कि इसका योगदान मौसम, हवा की दिशा, खेतों में आग लगने की घटनाओं और वातावरण में प्रदूषकों के फैलाव की स्थिति के अनुसार बदलता रहता है।
केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की ओर से लोकसभा में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली में 8 अक्टूबर से 7 दिसंबर 2024 के बीच पीएम 2.5 प्रदूषण में पराली जलाने की औसत हिस्सेदारी 10.6 प्रतिशत आंकी गई थी। इस अवधि में एक दिन इसका अधिकतम योगदान 35 प्रतिशत तक पहुंचा था।
इसी सरकारी जवाब में पिछले वर्षों के आंकड़े भी दिए गए थे। इनके अनुसार, पराली जलाने का औसत योगदान 2020 में 13 प्रतिशत, 2021 में 13 प्रतिशत, 2022 में 9 प्रतिशत और 2023 में 11 प्रतिशत था। हालांकि, इन वर्षों में कुछ दिनों पर इसकी हिस्सेदारी औसत से काफी अधिक रही। उदाहरण के लिए, 2021 में एक दिन यह 48 प्रतिशत तक पहुंची थी।
वर्ष 2026 के मौजूदा आंकड़े भी इस मौसमी प्रभाव को दिखाते हैं। भारतीय मौसम विज्ञान और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के तहत संचालित दिल्ली के वायु गुणवत्ता निर्णय सहायता तंत्र (Decision Support System) के पूर्वानुमान के अनुसार, 2 नवंबर को पीएम 2.5 में पराली जलाने की अनुमानित हिस्सेदारी 8.58 प्रतिशत थी। इसके 5 नवंबर तक बढ़कर करीब 22.2 प्रतिशत होने का अनुमान जताया गया था।
दूसरी ओर, 5 नवंबर की एक रिपोर्ट में आईआईटीएम के निर्णय सहायता तंत्र के आंकड़ों के आधार पर दिल्ली के प्रदूषण में पराली की हिस्सेदारी 20.2 प्रतिशत बताई गई। इसी दिन परिवहन क्षेत्र का योगदान 15.5 प्रतिशत दर्ज किया गया था।
2026 में पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं के आंकड़े
वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) की ओर से उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के मुताबिक, 15 सितंबर से 4 नवंबर 2026 के बीच पंजाब में पराली जलाने की 2,347 घटनाएं दर्ज की गईं। इसी अवधि में 2025 में 2,839 और 2023 में 14,173 घटनाएं दर्ज हुई थीं।
इन आंकड़ों से पिछले वर्षों की तुलना में पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं में कमी का संकेत मिलता है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि मौजूदा मौसम में पराली का प्रदूषण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा। नवंबर के शुरुआती दिनों में दिल्ली के प्रदूषण में इसकी हिस्सेदारी बढ़ने का अनुमान और कुछ दिनों के वास्तविक आकलन इस प्रभाव को दर्शाते हैं।
क्या 300 किलोमीटर की दूरी के कारण धुआं दिल्ली तक नहीं पहुंच सकता?
हरपाल सिंह चीमा ने पंजाब और दिल्ली के बीच दूरी तथा बीच में हरियाणा की भौगोलिक स्थिति को अपने सवाल का आधार बनाया है। लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से किसी राज्य की सीमा के बीच में होने या दूरी अधिक होने से हवा में मौजूद प्रदूषकों का दूसरे क्षेत्र तक पहुंचना असंभव नहीं हो जाता।
हवा की दिशा और गति के अनुसार धुआं तथा सूक्ष्म कण लंबी दूरी तय कर सकते हैं। नवंबर के दौरान उत्तर-पश्चिमी हवाएं पंजाब और हरियाणा की ओर से दिल्ली तक प्रदूषकों को पहुंचाने में भूमिका निभा सकती हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि हर दिन दिल्ली का प्रदूषण केवल पंजाब से आता है। यह प्रभाव मौसम और वायुमंडलीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
दिल्ली के प्रदूषण के स्रोत भी केवल पराली तक सीमित नहीं हैं। वाहनों से निकलने वाला धुआं, सड़क और निर्माण स्थलों की धूल, उद्योग, कचरा और अन्य प्रकार का ईंधन जलना तथा आसपास के एनसीआर क्षेत्रों से आने वाला प्रदूषण भी इसमें योगदान करते हैं। सर्दियों में हवा की गति कम होने और वातावरण में प्रदूषकों के फैलाव की क्षमता घटने से स्थिति और खराब हो सकती है।
राजनीतिक आरोपों से अलग जरूरी है प्रदूषण के सभी स्रोतों पर कार्रवाई
दिल्ली के प्रदूषण को लेकर भाजपा और आम आदमी पार्टी के बीच जारी बयानबाजी में एक ओर पंजाब सरकार किसानों को निशाना बनाए जाने का आरोप लगा रही है, वहीं दूसरी ओर भाजपा नेता पंजाब में पराली जलाने की घटनाओं को रोकने में राज्य सरकार की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं।
उपलब्ध आंकड़े यह बताते हैं कि पराली जलाना दिल्ली के प्रदूषण का एक वास्तविक मौसमी स्रोत है, लेकिन यह अकेला कारण नहीं है। इसी तरह पंजाब को पूरी तरह जिम्मेदार ठहराकर दिल्ली के स्थानीय और क्षेत्रीय प्रदूषण स्रोतों की अनदेखी करना भी समस्या का पूरा आकलन नहीं होगा।
दिल्ली और आसपास के राज्यों में वायु प्रदूषण से निपटने के लिए किसानों को पराली प्रबंधन के व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध कराने के साथ-साथ वाहनों, उद्योगों, निर्माण गतिविधियों और धूल पर नियंत्रण के उपाय भी जरूरी हैं। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर सभी संबंधित सरकारों के बीच समन्वित कार्रवाई ही इस समस्या का स्थायी समाधान दे सकती है।
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