जालौन: मलकपुरा पंचायत में कमीशनखोरी के आरोप, प्रधान ने सचिव पर लगाए गंभीर सवाल
ग्राम प्रधान अमित ने सोशल मीडिया पोस्ट में करीब 30 महीने के दौरान पंचायत सचिव को 1.70 लाख रुपये कमीशन देने का दावा किया है। सचिव ने आरोपों पर साक्ष्य मांगे हैं। ई-रिक्शा सेवा बंद होने का मामला भी विवाद में है।
ग्राम पंचायतों में विकास कार्यों के भुगतान और कथित कमीशनखोरी को लेकर एक बार फिर सवाल उठे हैं। जालौन की ग्राम पंचायत मलकपुरा के प्रधान अमित ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर एक पोस्ट साझा कर पंचायत सचिव जितेंद्र पटेल पर गंभीर आरोप लगाए हैं। प्रधान ने पोस्ट में अलग-अलग वित्तीय वर्षों के विकास कार्यों, उनकी लागत और कथित कमीशन का ब्योरा दिया है। उनका दावा है कि करीब 30 महीने के कार्यकाल में पंचायत सचिव को कुल 1 लाख 70 हजार 300 रुपये कमीशन के रूप में दिए गए। उन्होंने यह भी कहा कि छोटे-मोटे खर्च इस हिसाब में शामिल नहीं हैं।
दूसरी ओर, पंचायत सचिव जितेंद्र पटेल ने कमीशन लेने के आरोपों पर कहा है कि प्रधान अमित साक्ष्य सामने रखेंगे तो वह इस मामले में जवाब देंगे। ऐसे में यह मामला अब केवल सोशल मीडिया पर लगाए गए आरोपों तक सीमित नहीं है, बल्कि पंचायत के भुगतान रिकॉर्ड, कथित व्हाट्सऐप बातचीत और ई-रिक्शा संचालन से जुड़े दस्तावेजों की जांच का विषय बन गया है।
विकास कार्यों के भुगतान में कमीशन देने का दावा
प्रधान अमित की सोशल मीडिया पोस्ट के अनुसार, वित्तीय वर्ष 2024-25 में इंटरलॉकिंग, नाली निर्माण, अंबेडकर स्मारक के नवीनीकरण, पंचायत भवन की मरम्मत और अन्य विकास कार्यों के संबंध में कथित कमीशन दिए जाने का उल्लेख है। प्रधान ने इस अवधि के लिए 1,10,800 रुपये कमीशन और 26 हजार रुपये अन्य खर्चों के नाम पर देने का दावा किया है।
वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए उन्होंने 22,500 रुपये कथित कमीशन और तीन हजार रुपये अन्य खर्चों का हिसाब दिया है। वर्ष 2026-27 के कुछ कार्यों का विवरण भी पोस्ट में शामिल होने की बात कही गई है।
प्रधान का कहना है कि कुल मिलाकर करीब 30 महीने में 1,70,300 रुपये दिए गए। हालांकि, सार्वजनिक रूप से बताए गए मदों का पूरा वर्षवार और कार्यवार विवरण सामने आना जरूरी है, ताकि कुल रकम का मिलान किया जा सके।
पांच प्रतिशत कमीशन की बात पर नहीं बनी सहमति
प्रधान अमित का कहना है कि उन्होंने ग्राम पंचायत में विकास कार्यों को भ्रष्टाचार से दूर रखने का प्रयास किया, लेकिन कथित कमीशन व्यवस्था के कारण कई वर्षों तक विकास कार्य प्रभावित रहे। उनका दावा है कि बाद में उन्हें मजबूरी में इस व्यवस्था के तहत भुगतान करना पड़ा।
उन्होंने आरोप लगाया कि वह कमीशन की दर पांच प्रतिशत रखने के पक्ष में थे, लेकिन पंचायत सचिव इसके लिए तैयार नहीं हुए। उनके अनुसार, कुछ कार्यों में सात से नौ प्रतिशत तक कमीशन देना पड़ा। प्रधान ने अपनी पोस्ट में पंचायत से भ्रष्टाचार पूरी तरह खत्म नहीं कर पाने की जिम्मेदारी भी स्वीकार की है और दावा किया है कि इस संबंध में अधिकारियों को पहले भी चेतावनी दी गई थी।
इन आरोपों की पुष्टि के लिए संबंधित भुगतान, बैंक लेनदेन, बिल-वाउचर और कथित बातचीत की स्वतंत्र जांच जरूरी है।
छात्राओं के लिए ई-रिक्शा सेवा बंद होने से परेशानी
इस विवाद का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू पंचायत की ओर से संचालित ई-रिक्शा सेवा का बंद होना है। प्रधान अमित के मुताबिक, पंचायत में कक्षा नौ और उससे ऊपर की गरीब छात्राओं एवं छात्रों को पड़ोसी गांव के स्कूल तक पहुंचाने और वापस लाने के लिए मुफ्त ई-रिक्शा सेवा शुरू की गई थी। इसके अलावा रिक्शे का इस्तेमाल घर-घर कूड़ा संग्रहण और पौधों में सिंचाई जैसे कामों में भी किया जाता था।
प्रधान का आरोप है कि पंचायत सचिव के साथ विवाद के बाद यह सेवा बंद हो गई, जिससे छात्राओं को स्कूल आने-जाने में परेशानी हो रही है। उन्होंने सचिव पर छात्राओं के साथ कथित अभद्र व्यवहार करने और उनके फोन नंबर ब्लैकलिस्ट करने का आरोप भी लगाया है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
ई-रिक्शा बंद करने पर सचिव ने क्या कहा?
इस मामले में पंचायत सचिव जितेंद्र पटेल ने कहा कि उन्होंने छात्राओं के लिए ई-रिक्शा चलाने पर कभी सहमति नहीं दी थी। उनका तर्क है कि कूड़ा उठाने के लिए इस्तेमाल होने वाले वाहन से छात्राओं को लाना-ले जाना मोटर वाहन अधिनियम के तहत उचित नहीं है। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि हाल के दिनों में ई-रिक्शे का इस्तेमाल व्यावसायिक गतिविधियों के लिए किया जा रहा था और उसे किराये पर चलवाया जा रहा था।
वहीं, प्रधान की ओर से उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों और दावों के अनुसार, सितंबर 2024 से यह रिक्शा कूड़ा संग्रहण, पौधों की सिंचाई और छात्राओं को स्कूल पहुंचाने जैसे कामों में इस्तेमाल होता रहा है। प्रधान का कहना है कि इस व्यवस्था की जानकारी जिले के अधिकारियों को भी थी और शुरुआत के समय स्थानीय समाचार पत्र में इसकी खबर प्रकाशित हुई थी।
प्रधान की ओर से साझा की गई एक अन्य पोस्ट में ई-रिक्शे से किए गए अलग-अलग कार्यों और कुछ सेवाओं के बदले किराया वसूलने का भी उल्लेख है। उनका दावा है कि किराये की रसीदों पर पंचायत सचिव के हस्ताक्षर मौजूद हैं। यदि इन दस्तावेजों की पुष्टि होती है, तो सचिव के उस बयान पर सवाल उठ सकते हैं जिसमें उन्होंने ई-रिक्शा संचालन पर अपनी सहमति से इनकार किया है।
26 मई के बाद काम न होने पर सचिव ने क्या सफाई दी?
बुंदेलखंड रिपोर्ट ने पंचायत सचिव जितेंद्र पटेल से फोन पर बातचीत कर पूछा कि 26 मई के बाद मलकपुरा पंचायत में कौन-कौन से नए कार्य कराए गए और यदि काम नहीं हुए तो इसकी वजह क्या थी।
इस पर सचिव ने कहा कि प्रधान की भूमिका प्रशासक के रूप में होने के बाद उनके पास 26 मई के बाद नए कार्य कराने का अधिकार नहीं था। उन्होंने यह भी कहा कि अन्य पंचायतों में भी इस अवधि के बाद नए काम नहीं कराए गए और केवल पहले से स्वीकृत कार्य ही पूरे कराए गए।
हालांकि, ई-ग्राम स्वराज पोर्टल पर अन्य ग्राम पंचायतों में काम होने का दावा किया गया है, जहां जितेंद्र पटेल सचिव का प्रभार संभाल रहे हैं। इस आधार पर मलकपुरा और अन्य पंचायतों में कामकाज की स्थिति की तुलना किए जाने की जरूरत है। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि 26 मई के बाद किन कार्यों को मंजूरी मिली, किनका भुगतान हुआ और संबंधित कार्य किस प्रशासनिक व्यवस्था के तहत कराए गए।
व्हाट्सऐप चैट और भुगतान रिकॉर्ड की जांच जरूरी
कमीशनखोरी के आरोपों पर सचिव जितेंद्र पटेल ने कहा कि यदि प्रधान अमित साक्ष्य सामने रखेंगे तो वह जवाब देंगे। वहीं, बुंदेलखंड रिपोर्ट का दावा है कि उसके पास ऐसी व्हाट्सऐप चैट मौजूद हैं, जिनमें सचिव कथित तौर पर कमीशन की मांग करते दिखाई देते हैं।
प्रधान अमित का यह भी दावा है कि ई-ग्राम स्वराज पोर्टल पर कुछ भुगतान रिजेक्ट हुए थे और ये वही भुगतान हैं, जिनसे जुड़े कमीशन का एक हिस्सा सचिव मांग रहे थे। हालांकि, केवल भुगतान रिजेक्ट होने से कमीशन मांगने का आरोप अपने आप साबित नहीं होता। इसके लिए चैट की प्रामाणिकता, भुगतान का पूरा रिकॉर्ड और संबंधित लोगों के बयान की जांच जरूरी है।
अब प्रशासनिक जांच से ही स्पष्ट होगी स्थिति
मलकपुरा पंचायत के मामले में अब कई सवालों के जवाब मिलना बाकी हैं। क्या विकास कार्यों के भुगतान में वास्तव में कमीशन लिया गया? क्या ई-रिक्शा सेवा नियमों के अनुरूप संचालित हो रही थी? छात्राओं के लिए यह सुविधा किसकी अनुमति से शुरू हुई और इसे बंद करने का निर्णय किस स्तर पर लिया गया?
इन सवालों की निष्पक्ष जांच के लिए पंचायत के मूल बिल-वाउचर, बैंक रिकॉर्ड, ई-ग्राम स्वराज पर दर्ज भुगतान, ई-रिक्शे की खरीद और संचालन से जुड़े दस्तावेज तथा कथित व्हाट्सऐप चैट की तकनीकी जांच जरूरी है। साथ ही, प्रधान और पंचायत सचिव दोनों के बयानों को जांच का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
फिलहाल, प्रधान के आरोपों और सचिव के जवाब के बीच विवाद बना हुआ है। प्रशासनिक जांच के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि पंचायत में वित्तीय अनियमितता हुई है या नहीं और ई-रिक्शा सेवा बंद करने के पीछे वास्तविक कारण क्या था।
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