125 साल से रेल कनेक्टिविटी का इंतजार कर रहा जालौन, तीन सर्वे के बाद भी अधूरी है मांग
कोंच से दिबियापुर तक रेलवे लाइन बढ़ाने की परिकल्पना 1901 के जालौन गजेटियर में दर्ज है। कई सर्वे और आंदोलनों के बावजूद जालौन नगर अब तक रेल नेटवर्क से नहीं जुड़ सका है।
जिले का मुख्यालय होने के बावजूद जालौन नगर आज तक भारतीय रेल के मानचित्र पर अपनी जगह नहीं बना सका है। नगर को रेलवे नेटवर्क से जोड़ने की मांग एक सदी से भी अधिक पुरानी है। कई बार सर्वे, जनप्रतिनिधियों से मुलाकात और आंदोलनों के बावजूद यह मांग अब तक पूरी नहीं हो पाई है। अब क्षेत्रीय सांसद भानु प्रताप वर्मा के केंद्रीय मंत्री बनने के बाद स्थानीय लोगों को एक बार फिर इस दिशा में उम्मीद जगी है।
उपलब्ध ऐतिहासिक विवरण के अनुसार, वर्ष 1901 में तैयार कोंच-एट रेलवे लाइन को आगे दिबियापुर तक बढ़ाने की योजना पर विचार किया गया था। इस विस्तार से जालौन नगर को भी रेल नेटवर्क से जोड़ा जा सकता था। जालौन गजेटियर, 1901 में भी इस प्रस्ताव का उल्लेख होने की बात कही गई है। हालांकि, विभिन्न ऐतिहासिक परिस्थितियों और बाद के घटनाक्रमों के बीच यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी। परिणामस्वरूप, जनपद के नाम पर बसे जालौन नगर को आज तक रेल सुविधा का इंतजार है।
इस मांग को दोबारा उठाने के लिए भाजपा के पूर्व नगर अध्यक्ष वाचस्पति मिश्रा के नेतृत्व में श्रवण कुमार श्रीवास्तव, अन्नी मित्तल, केसी पाटकार और योगेंद्र राठौर ने दिल्ली में सांसद एवं केंद्रीय मंत्री भानु प्रताप वर्मा से मुलाकात की। प्रतिनिधिमंडल ने उन्हें नगर को रेलवे लाइन से जोड़ने की लंबे समय से चली आ रही मांग और पूर्व में हुए आंदोलनों की जानकारी दी। प्रतिनिधिमंडल के अनुसार, केंद्रीय मंत्री ने इस मांग को पूरा कराने के लिए हरसंभव प्रयास करने का आश्वासन दिया है।
तीन रेल मार्गों के हो चुके हैं सर्वे
जालौन को रेल नेटवर्क से जोड़ने के लिए रेलवे की ओर से अलग-अलग समय पर तीन प्रस्तावित मार्गों का सर्वे कराया जा चुका है। वर्ष 2008 में 69 किलोमीटर लंबे कोंच-उरई वाया जालौन रेल मार्ग का सर्वे हुआ था। इसके बाद वर्ष 2012 में राठ-महोबा-भिंड वाया जालौन के 218 किलोमीटर लंबे रेल मार्ग का सर्वे कराया गया। वर्ष 2014 में कोंच-जालौन-फफूंद के बीच 89.68 किलोमीटर लंबे रेल मार्ग का सर्वे भी हुआ।
स्थानीय लोगों का कहना है कि इन सर्वेक्षणों के बाद भी परियोजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक बजट और स्वीकृति नहीं मिल सकी। इस वजह से रेल संपर्क की मांग अब तक कागजों तक सीमित है।
65 दिनों तक चला था आंदोलन
रेलवे लाइन की मांग को लेकर वर्ष 2016 में रेल लाओ स्वाभिमान बचाओ संघर्ष समिति के नेतृत्व में आंदोलन किया गया था। मार्च से मई 2016 तक तहसील गेट के सामने 65 दिनों तक अनशन और धरना चला। इस दौरान 5 मार्च 2016 को नगर में मशाल जुलूस भी निकाला गया था। आंदोलन में स्थानीय लोगों की भागीदारी के जरिए रेलवे लाइन की मांग को प्रमुखता से उठाया गया।
आंदोलन के दौरान तत्कालीन सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री भानु प्रताप वर्मा ने 7 अप्रैल 2016 को सभा को संबोधित करते हुए जालौन को रेलवे लाइन से जोड़ने के लिए प्रयास करने का आश्वासन दिया था। आंदोलनकारियों के अनुसार, उन्होंने इस मुद्दे को लोकसभा में भी दो बार उठाया था। हालांकि, इसके बाद भी परियोजना को मंजूरी नहीं मिल सकी।
रेल कनेक्टिविटी को विकास से जोड़कर देख रहे स्थानीय लोग
स्थानीय लोगों का मानना है कि जालौन नगर के रेल नेटवर्क से जुड़ने पर क्षेत्र में आवागमन की सुविधा बढ़ेगी और व्यापार, रोजगार तथा आर्थिक गतिविधियों को भी लाभ मिल सकता है। रेलवे लाइन के समर्थकों ने पहले यह सुझाव भी दिया था कि एट-कोंच रेल मार्ग का विस्तार कर इसे जालौन तक पहुंचाया जाए। उनका तर्क है कि इससे मौजूदा रेल मार्ग का उपयोग बढ़ सकता है और क्षेत्र को रेल सुविधा मिल सकती है।
1956 में भी मिला था आश्वासन
जालौन नगर को रेलवे लाइन से जोड़ने की मांग का इतिहास स्वतंत्रता के बाद के शुरुआती वर्षों तक जाता है। स्थानीय विवरण के मुताबिक, वर्ष 1956 में तत्कालीन रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री विधानसभा चुनाव से पहले जालौन आए थे। सब्जी मंडी परिसर में आयोजित जनसभा में लोगों ने उनके सामने नगर को रेल नेटवर्क से जोड़ने की मांग रखी थी। बताया जाता है कि उन्होंने इस दिशा में प्रयास का आश्वासन दिया था।
हालांकि, नवंबर 1956 में हुई रेल दुर्घटना के बाद लाल बहादुर शास्त्री ने रेल मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद भी जालौन को रेलवे से जोड़ने की मांग पूरी नहीं हो सकी।
अब केंद्रीय मंत्री भानु प्रताप वर्मा से प्रतिनिधिमंडल की मुलाकात के बाद स्थानीय लोगों को उम्मीद है कि वर्षों से लंबित यह मांग आगे बढ़ सकती है। हालांकि, परियोजना की वास्तविक प्रगति के लिए रेलवे की स्वीकृति, बजट आवंटन और निर्माण संबंधी आधिकारिक निर्णय का इंतजार रहेगा।
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