सलाखों के पीछे सूखती आंखें
सलाखों के पीछे सूखती आंखें
'रेड लाइट' पर रुकी
गाड़ियों की लंबी कतार
और
इन कतारों के बीच
खड़ी एक प्रिज़न वैन
जिसके भीतर से
बाहर की दुनिया को
निहारती तमाम आँखें,
उन आँखों में मुझे
मायूसी दिखती है,
बाहर घूमने की,
खुली हवा में
साँस लेने की,
आज़ाद होने की।
जानता हूँ मैं कि
कैदी हैं वो,
किसी न किसी जुर्म
में ही क़ैद किए गए हैं,
पर यह भी जानता हूँ
कि उनमें से बहुत-से
जुर्म करना नहीं चाहते थे,
उन्हें जुर्म करने पर
मजबूर किया गया
मेरे और तुम्हारे इस
'समाज' के द्वारा।
किसी ने उठाया था
किसी की बहन की
इज़्ज़त पर हाथ,
फिर मजबूर होकर
अपने सारे सपने छोड़
खूनी बना वो,
जिसकी सज़ा काट रहा
अब सलाखों के पीछे।
आँखें देखती हैं
आइसक्रीम खाते
जोड़ों को,
देखती हैं एक पिता
को अपने बेटे के लिए
गुब्बारे लेते हुए,
देखती हैं वे अंदर से
बाहर के मुस्कुराते और
खिलखिलाते चेहरों को
और याद करती हैं अपनी
आज़ादी के वे दिन।
अचानक.....
'रेड लाइट' हरी हो जाती है
और गाड़ी आगे निकलने
लगती है,
पर आँखें अभी भी जाली
से सटे हुए बाहर की तरफ
देखती हैं अनिमेष,
पर मुझे अब उन आँखों में
नमी नहीं दिखती,
उन आँखों का पानी
अब सूख चुका है,
गाड़ी अगले मोड़ से
मुड़ जाती है एक
ऐसे रास्ते पर
जिस पर
कोई अन्य गाड़ी जाते
हुए दिखाई नहीं देती।
पाठकों की राय (2)
Heart touching.
Realistic