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दीपोत्सव की लौ में धुंधलाती कुम्हार की उम्मीदें: बाजारवाद की चकाचौंध में बुझते मिट्टी के दीये

जालौन के कुम्हारों का कहना है कि बदलती पसंद और घटती बिक्री से उनकी आजीविका प्रभावित हो रही है। इलेक्ट्रिक चाक खराब होने के बाद राधाचरण प्रजापति को इसे अपने खर्च पर ठीक कराना पड़ा।

दीपोत्सव की लौ में धुंधलाती कुम्हार की उम्मीदें: बाजारवाद की चकाचौंध में बुझते मिट्टी के दीये

दीपावली पर घरों और बाजारों में रोशनी की तैयारियां शुरू हो जाती हैं। बिजली की झालरों और सजावटी लाइटों के बीच मिट्टी के दीयों की पारंपरिक जगह अब पहले जैसी नहीं रह गई है। इसका असर उन कुम्हार परिवारों पर पड़ रहा है, जिनकी कई पीढ़ियां मिट्टी के दीये बनाकर अपनी आजीविका चलाती रही हैं।

जालौन के मोहल्ला धर्मशाला निवासी कुम्हार राधाचरण प्रजापति बताते हैं कि दीये बनाना उनके परिवार का पुश्तैनी काम है। उनके बाबा कढ़ोरे और पिता रामभरोसे भी इसी व्यवसाय से जुड़े रहे। दीपावली से करीब दो महीने पहले ही उनका परिवार दीये बनाने में जुट जाता है और तैयार दीयों को बिक्री के लिए जमा किया जाता है।

राधाचरण के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में मिट्टी के दीयों की मांग कम हुई है। उनका कहना है कि पहले दीपावली के दौरान अच्छी बिक्री हो जाती थी, लेकिन अब हर साल कारोबार को लेकर चिंता बनी रहती है। उन्होंने आशंका जताई कि यदि यही स्थिति रही तो आने वाले समय में उन्हें यह काम बंद करना पड़ सकता है।

इसी तरह कुम्हार सोनू प्रजापति का कहना है कि दीये बनाने की कला उन्हें विरासत में मिली है। पहले दीपावली के समय होने वाली बिक्री से परिवार के सालभर के खर्च में मदद मिलती थी, लेकिन अब इस कारोबार से पर्याप्त आमदनी नहीं हो पा रही है।

अब खुद बाजार में बेचने पड़ रहे दीये

राधाचरण बताते हैं कि पहले वे दीये बनाते थे और फेरी लगाने वाले व्यापारी उन्हें खरीदकर ले जाते थे। मांग कम होने के बाद ऐसे खरीदारों का आना घट गया। अब उन्हें खुद हाट-बाजार में जाकर दीये बेचने पड़ते हैं।

उनका कहना है कि स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने की अपील के बावजूद मिट्टी के दीयों को पहले जैसी प्राथमिकता नहीं मिल रही है। बाजार में सजावटी और बिजली से चलने वाली लाइटों की उपलब्धता के बीच पारंपरिक दीयों की बिक्री प्रभावित हुई है।

सरकारी इलेक्ट्रिक चाक भी नहीं चला लंबे समय तक

राधाचरण के मुताबिक, करीब तीन वर्ष पहले उन्हें सरकार की ओर से इलेक्ट्रिक चाक मिला था, लेकिन वह एक साल भी ठीक से नहीं चल सका। चाक खराब होने के बाद उन्होंने अपने खर्च पर करीब आठ हजार रुपये लगाकर दूसरा चाक बनवाया। फिलहाल उसी की मदद से वे दीये बनाने का काम कर रहे हैं।

कुम्हार परिवारों की यह स्थिति पारंपरिक हस्तकला से जुड़े छोटे कारीगरों के सामने मौजूद आर्थिक चुनौतियों को दिखाती है। दीपावली पर मिट्टी के दीयों की खरीदारी केवल सजावट तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे उन परिवारों की आजीविका भी जुड़ी है, जो पीढ़ियों से इस कला को जीवित रखे हुए हैं।

✓ संपादकीय जाँच: प्रूफ़रीडिंग DP Singh · प्रकाशन की मंज़ूरी DP Singh · हमारे मानक

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