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समुद्र से आसमान तक भारत की नई तकनीक: क्या हैं मातंगी, वरुणा और स्ट्रैटोस्फेरिक UAV

भारत में ऐसे मानवरहित समुद्री और हवाई वाहन विकसित किए जा रहे हैं, जिन्हें हर समय इंसान के बैठकर चलाने की जरूरत नहीं होती। जानिए मातंगी, वरुणा और ऊंचाई पर उड़ने वाले UAV की तकनीक कैसे काम करती है और रक्षा क्षेत्र में इनका क्या उपयोग हो सकता है।

समुद्र से आसमान तक भारत की नई तकनीक: क्या हैं मातंगी, वरुणा और स्ट्रैटोस्फेरिक UAV

भारत रक्षा क्षेत्र में अपनी तकनीक को मजबूत बनाने और स्वदेशी उपकरण विकसित करने पर लगातार काम कर रहा है। इसी दिशा में सागर डिफेंस इंजीनियरिंग का बनाया गया ‘मातंगी’ नाम का मानवरहित समुद्री पोत चर्चा में है। यह एक ऐसा समुद्री वाहन है, जिसे चलाने के लिए किसी इंसान को इसमें बैठने की जरूरत नहीं होती।

‘मातंगी’ ने साल 2024 में मुंबई से तमिलनाडु के तूतीकोरिन तक करीब 1,500 किलोमीटर का सफर बिना किसी इंसान के सवार हुए पूरा किया था। इस उपलब्धि के साथ इसने समुद्र में लंबी दूरी तक बिना चालक के सफर करने की अपनी क्षमता दिखाई। इस पोत में ऐसी आधुनिक तकनीकें लगाई गई हैं, जो इसे समुद्र में अपना रास्ता पहचानने और दूसरी नावों या जहाजों से टकराने से बचने में मदद करती हैं। ऐसी तकनीकें समुद्र में निगरानी करने और जरूरी जानकारी जुटाने में उपयोगी साबित हो सकती हैं।

भारत में मानवरहित तकनीक का विकास सिर्फ समुद्र तक सीमित नहीं है, बल्कि हवाई क्षेत्र में भी इस दिशा में काम किया जा रहा है। इसका एक उदाहरण ‘वरुणा’ है, जिसे एक व्यक्ति को हवा में ले जाने वाले पायलटलेस एरियल व्हीकल के रूप में विकसित किया गया है। इसकी पेलोड क्षमता करीब 150 किलोग्राम बताई गई है। इस तरह की तकनीक भविष्य में लोगों और जरूरी सामान को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने के नए विकल्प तैयार कर सकती है।

इसके अलावा, कलाम लैब्स का स्ट्रैटोस्फेरिक UAV भी चर्चा में है। यह एक ऐसी मानवरहित हवाई प्रणाली है, जिसकी परिकल्पना 1.18 लाख फीट से अधिक ऊंचाई पर मौजूद बैलून प्लेटफॉर्म से लॉन्च करने के लिए की गई है। इतनी ऊंचाई पर काम करने वाली प्रणालियों का इस्तेमाल निगरानी, संचार और वैज्ञानिक गतिविधियों जैसे क्षेत्रों में किया जा सकता है।

इन परियोजनाओं से पता चलता है कि भारत समुद्र और आसमान, दोनों क्षेत्रों में मानवरहित प्रणालियों और स्वदेशी तकनीक को विकसित करने की दिशा में प्रयास कर रहा है। आने वाले समय में ऐसी तकनीकें रक्षा क्षेत्र में निगरानी, सुरक्षा और दूर-दराज के क्षेत्रों तक पहुंच बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

✓ संपादकीय जाँच: प्रूफ़रीडिंग DP Singh · प्रकाशन की मंज़ूरी DP Singh · हमारे मानक

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