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मोहन भागवत बोले- भारत को तोड़ने की कोशिशें नहीं होंगी सफल, आंदोलनों से नहीं समाज से निकलेगा समाधान

नागपुर में विजयादशमी पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि भारत को कमजोर करने की कोशिशें सफल नहीं होंगी। उन्होंने विरोध प्रदर्शनों, राजनीतिक अस्थिरता और देश की एकता पर अपनी बात रखी।

मोहन भागवत बोले- भारत को तोड़ने की कोशिशें नहीं होंगी सफल, आंदोलनों से नहीं समाज से निकलेगा समाधान

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने विजयादशमी के मौके पर कहा कि भारत को तोड़ने या कमजोर करने की कोशिशें सफल नहीं होंगी। उनका कहना है कि भारत लगातार आगे बढ़ रहा है और कुछ ताकतें इस प्रगति को रोकना चाहती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि केवल सत्ता बदलने से समस्याओं का समाधान नहीं होता, बल्कि इसके लिए समाज के भीतर से प्रयास करने की जरूरत है।

भागवत मंगलवार को नागपुर में आरएसएस के वार्षिक विजयादशमी समारोह को संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने देश की एकता, राजनीतिक आंदोलनों, सामाजिक तनाव और भारत के विकास जैसे मुद्दों पर अपनी बात रखी।

भारत को लेकर क्या बोले मोहन भागवत?

भागवत ने कहा कि भारत की प्रगति कुछ ताकतों को पसंद नहीं है। उनके मुताबिक, भारत जिस तरह निर्णायक नीतियों के साथ आगे बढ़ रहा है, उसे रोकने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने दावा किया कि इन कोशिशों का निशाना भारत के साथ-साथ आरएसएस भी है।

उन्होंने कहा कि दुनिया में ऐसी ताकतें मौजूद हैं जो चाहती हैं कि भारत सफल न हो। इसलिए देश के लोगों को सतर्क रहने और अपनी एकता बनाए रखने की जरूरत है।

यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये बातें भागवत ने अपने संबोधन में कही हैं। इनके जरिए उन्होंने देश के सामने मौजूद चुनौतियों को लेकर अपना नजरिया रखा।

आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों पर क्या कहा?

आरएसएस प्रमुख ने कहा कि विरोध प्रदर्शन हमेशा समस्याओं का समाधान नहीं होते। उन्होंने आगाह किया कि जब आंदोलनों को राजनीतिक मकसद से चलाया जाता है या लोगों को उकसाया जाता है, तो उनका इस्तेमाल तनाव बढ़ाने और सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ने के लिए किया जा सकता है।

उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया को लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। एसआईआर का मतलब है मतदाता सूची की विशेष गहन जांच और संशोधन की प्रक्रिया।

भागवत का कहना था कि समस्याओं को सुलझाने के लिए समाज के भीतर से रास्ते तलाशने चाहिए। उनके मुताबिक, सिर्फ यह उम्मीद करना कि सरकार बदलने से सब कुछ बदल जाएगा, सही सोच नहीं है।

हालांकि, उनके इस बयान का अर्थ यह नहीं है कि हर विरोध प्रदर्शन बेकार है। लोकतंत्र में विरोध जताना नागरिकों का अधिकार है। भागवत ने खास तौर पर उन आंदोलनों को लेकर चिंता जताई, जिनके पीछे उनके अनुसार राजनीतिक उकसावे या अव्यवस्था फैलाने की मंशा हो सकती है।

फ्रांस, बांग्लादेश और नेपाल का उदाहरण क्यों दिया?

अपने भाषण में भागवत ने फ्रांस, बांग्लादेश और नेपाल का जिक्र किया। इन देशों में अलग-अलग मुद्दों को लेकर सरकारों के खिलाफ बड़े आंदोलन हुए हैं।

बांग्लादेश में 2024 में छात्रों का आंदोलन व्यापक विरोध में बदल गया था। इसके बाद शेख हसीना की सरकार सत्ता से बाहर हो गई। नेपाल में सितंबर 2025 में जेन-ज़ी यानी युवा पीढ़ी के विरोध प्रदर्शनों के बाद केपी शर्मा ओली की सरकार गिर गई थी।

फ्रांस में भी जीवन-यापन की बढ़ती लागत और सार्वजनिक सेवाओं जैसे मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन हुए हैं।

भागवत ने इन घटनाओं का हवाला देते हुए कहा कि भारत को भी ऐसी परिस्थितियों से सतर्क रहना चाहिए। उनका मानना है कि राजनीतिक अस्थिरता और सामाजिक तनाव का फायदा देश को कमजोर करने वाली ताकतें उठा सकती हैं।

'वंदे मातरम' और बंगाल के विभाजन का जिक्र

भागवत ने अपने भाषण में इतिहास का उदाहरण देते हुए बंगाल के विभाजन और राष्ट्रीय गीत 'वंदे मातरम' की भूमिका पर भी बात की।

उन्होंने कहा कि जब ब्रिटिश शासन के दौरान लॉर्ड कर्जन ने 1905 में बंगाल का विभाजन किया, तो इसका व्यापक विरोध हुआ। इस विरोध में 'वंदे मातरम' एकता और देशभक्ति के प्रतीक के रूप में उभरा। आखिरकार, ब्रिटिश सरकार ने 1911 में बंगाल के विभाजन को रद्द कर दिया।

भागवत ने सवाल उठाया कि जब उस समय समाज एकजुट होकर विभाजन का विरोध कर सकता था, तो 1947 में देश का विभाजन क्यों नहीं रोका जा सका?

उनके अनुसार, धार्मिक पहचान, आपसी अविश्वास, राजनीतिक स्वार्थ और अलगाव की भावना ने समाज को बांटने में भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि जब लोग एक-दूसरे को अलग मानने लगते हैं, तो एकता कमजोर पड़ जाती है।

यह इतिहास की उन घटनाओं पर भागवत की अपनी व्याख्या थी, जिनके जरिए उन्होंने सामाजिक एकता का संदेश देने की कोशिश की।

आरएसएस के स्थापना दिवस पर हुआ कार्यक्रम

आरएसएस की स्थापना 27 सितंबर 1925 को विजयादशमी के दिन डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में की थी। संघ हर साल विजयादशमी पर अपना स्थापना दिवस मनाता है। इस मौके पर सरसंघचालक स्वयंसेवकों को संबोधित करते हैं।

इस वर्ष के समारोह में दैनिक जागरण के मुख्य संपादक संजय गुप्त को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ भी कार्यक्रम में मौजूद थे।

इस भाषण का मुख्य संदेश क्या था?

मोहन भागवत के पूरे संबोधन का मुख्य संदेश देश की एकता और सामाजिक सतर्कता से जुड़ा था। उन्होंने कहा कि भारत को मजबूत बनाने के लिए लोगों को आपसी मतभेदों से ऊपर उठकर सोचना चाहिए।

उन्होंने विरोध प्रदर्शनों और राजनीतिक आंदोलनों के जरिए बदलाव लाने की कोशिशों पर सवाल उठाए और समाज के भीतर से समाधान निकालने पर जोर दिया।

उनके बयान से यह भी स्पष्ट होता है कि आरएसएस प्रमुख देश की मौजूदा राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों को भारत की एकता तथा विकास के नजरिए से देखते हैं। हालांकि, आंदोलनों की भूमिका, सरकारों की जवाबदेही और लोकतांत्रिक विरोध के महत्व पर अलग-अलग राजनीतिक दलों और सामाजिक समूहों की राय अलग हो सकती है।

✓ संपादकीय जाँच: प्रूफ़रीडिंग DP Singh · प्रकाशन की मंज़ूरी DP Singh · हमारे मानक

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