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क्या कनाडा से अलग होगा अल्बर्टा? तेल से अमीर प्रांत में जनमत संग्रह, समझिए पूरा मामला

कनाडा के तेल उत्पादक प्रांत अल्बर्टा में 19 अक्टूबर को इस सवाल पर मतदान हुआ कि क्या कनाडा से अलग होने पर भविष्य में बाध्यकारी जनमत संग्रह कराने की कानूनी प्रक्रिया शुरू की जाए। यह वोट सीधे आजादी का फैसला नहीं करता।

क्या कनाडा से अलग होगा अल्बर्टा? तेल से अमीर प्रांत में जनमत संग्रह, समझिए पूरा मामला

क्या किसी देश का एक प्रांत उससे अलग होने की प्रक्रिया शुरू कर सकता है? कनाडा में इन दिनों इसी सवाल पर बहस हो रही है। देश के तेल से समृद्ध प्रांत अल्बर्टा में 19 अक्टूबर को जनमत संग्रह कराया गया। इसमें लोगों से पूछा गया कि क्या प्रांत को कनाडा का हिस्सा बने रहना चाहिए या फिर देश से अलग होने के सवाल पर भविष्य में एक बाध्यकारी जनमत संग्रह कराने की कानूनी प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए।

लेकिन यहां एक बात समझना जरूरी है। इस मतदान में लोगों से सीधे यह नहीं पूछा गया कि अल्बर्टा कनाडा से अलग हो जाए या नहीं। यह पहला कदम है, जिसके जरिए यह तय होना है कि अलग होने के मुद्दे पर आगे कानूनी प्रक्रिया शुरू की जाए या नहीं।

मतदान के नतीजे आने के बाद भी अल्बर्टा तुरंत कनाडा से अलग नहीं हो जाएगा। इसके लिए आगे कई कानूनी और संवैधानिक प्रक्रियाओं से गुजरना होगा।

आखिर अल्बर्टा कनाडा से अलग क्यों होना चाहता है?

अल्बर्टा कनाडा के पश्चिमी हिस्से में स्थित एक प्रांत है। यहां करीब 50 लाख लोग रहते हैं। इसकी अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा तेल और प्राकृतिक गैस के कारोबार पर निर्भर है। कनाडा के ऊर्जा क्षेत्र में इस प्रांत की अहम भूमिका है।

विवाद की जड़ केंद्र सरकार और अल्बर्टा के बीच लंबे समय से चला आ रहा मतभेद है। अल्बर्टा में कई लोगों का मानना है कि ओटावा स्थित संघीय सरकार की पर्यावरण और ऊर्जा नीतियां तेल-गैस उद्योग के विकास में रुकावट पैदा करती हैं।

अलग देश बनाने के समर्थकों का यह भी कहना है कि अल्बर्टा कनाडा की अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान देता है, लेकिन बदले में उसे उतना फायदा नहीं मिलता। उनका आरोप है कि देश की राजनीति में ओंटारियो और क्यूबेक जैसे अधिक आबादी वाले प्रांतों का प्रभाव ज्यादा है, जबकि अल्बर्टा की बात को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता।

हालांकि, यह अलगाव समर्थकों का नजरिया है। कनाडा से अलग होने के विरोधियों का कहना है कि इससे आर्थिक अनिश्चितता बढ़ सकती है और प्रांत के लोगों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

जनमत संग्रह में लोगों से क्या पूछा गया?

इस जनमत संग्रह में कुल 10 सवाल रखे गए थे। पहले नौ सवालों के जवाब हां या ना में देने थे, जबकि दसवें सवाल में लोगों को दो विकल्पों में से एक चुनना था।

दसवां सवाल अल्बर्टा के भविष्य से जुड़ा सबसे अहम सवाल था। लोगों को चुनना था कि अल्बर्टा कनाडा का प्रांत बना रहे या फिर सरकार कनाडा के संविधान के तहत वह कानूनी प्रक्रिया शुरू करे, जिससे आगे चलकर अलग होने पर बाध्यकारी जनमत संग्रह कराया जा सके।

बाकी नौ सवालों में आव्रजन यानी इमिग्रेशन और संवैधानिक बदलावों से जुड़े मुद्दे शामिल थे। इनमें प्रांत को आव्रजन पर ज्यादा नियंत्रण देने, कुछ सरकारी सुविधाओं के लिए पात्रता के नियम बदलने और मतदान से जुड़े नियमों में बदलाव जैसे प्रस्ताव शामिल थे।

इसलिए यह केवल अलग देश बनने का सवाल नहीं था। इसके जरिए प्रांतीय सरकार और केंद्र के बीच अधिकारों को लेकर चल रही बहस भी जनता के सामने रखी गई।

क्या अल्बर्टा अब कनाडा से अलग हो जाएगा?

नहीं, कम से कम इस मतदान के आधार पर ऐसा नहीं कहा जा सकता।

यह जनमत संग्रह बाध्यकारी नहीं है। इसका मतलब है कि इसका परिणाम अपने आप अल्बर्टा को कनाडा से अलग नहीं कर देता। अगर अलग होने की कानूनी प्रक्रिया शुरू करने के पक्ष में बहुमत मिलता है, तब भी आगे संवैधानिक प्रक्रिया, बातचीत और कानूनी सवालों का समाधान जरूरी होगा।

कनाडा के कानून के तहत किसी प्रांत के अलग होने का सवाल केवल एक मतदान से तय नहीं होता। स्पष्ट जनमत और संवैधानिक नियमों के अनुसार आगे की प्रक्रिया जरूरी है। वहां रहने वाले आदिवासी समुदायों यानी फर्स्ट नेशंस के अधिकार और ऐतिहासिक संधियां भी इस बहस का अहम हिस्सा हैं।

यानी इस वोट को कनाडा से अलग होने का अंतिम फैसला समझना गलत होगा। यह उस दिशा में आगे बढ़ने के सवाल पर जनता की राय जानने का एक कदम है।

प्रधानमंत्री मार्क कार्नी क्यों कर रहे हैं राष्ट्रीय एकता की बात?

कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी अल्बर्टा में पले-बढ़े हैं और उन्होंने प्रांत को देश के साथ बनाए रखने की अपील की है। उनका मानना है कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों और अमेरिका के साथ व्यापारिक तनाव के बीच कनाडा की एकता महत्वपूर्ण है।

अल्बर्टा की प्रीमियर डेनियल स्मिथ ने भी अलग होने का समर्थन नहीं किया है। हालांकि, उनकी अपनी पार्टी यूनाइटेड कंजर्वेटिव पार्टी के भीतर अलगाव समर्थकों का दबाव बढ़ रहा था। इसी दबाव के बीच उन्होंने जनमत संग्रह कराने का फैसला लिया।

इससे अल्बर्टा की राजनीति में एक दिलचस्प स्थिति बनी है। प्रांत की सरकार की मुखिया खुद अलग होने के पक्ष में नहीं हैं, लेकिन उन्हें इस मुद्दे पर जनता की राय लेने के लिए मतदान कराना पड़ा।

मतदान में लोगों की कितनी दिलचस्पी थी?

मतदान में लोगों की रुचि काफी ज्यादा दिखाई दी। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 13 से 17 अक्टूबर के बीच अग्रिम मतदान और विशेष मतपत्रों के जरिए कुल 13,56,873 वोट डाले गए थे। इसमें डाक से भेजे गए विशेष मतपत्र भी शामिल थे।

हालांकि, मतदान के दिन 100 से ज्यादा मतदान केंद्रों के समय पर नहीं खुल पाने की खबरें आईं। कुछ केंद्रों पर लोगों को वोट डालने का मौका देने के लिए समय बढ़ाया गया। इससे मतगणना और नतीजे जारी होने की प्रक्रिया में देरी हुई।

मतपत्रों की गिनती हाथ से की जानी थी। चुनाव अधिकारियों के अनुसार, सभी मतदान केंद्र बंद होने के बाद अनौपचारिक नतीजे जारी करने के लिए अधिकतम 48 घंटे का समय निर्धारित था। आधिकारिक नतीजों की घोषणा 29 अक्टूबर को होनी है।

क्या यह विवाद मतदान के बाद खत्म हो जाएगा?

संभव है कि मतदान का नतीजा अलगाव समर्थकों को आगे बढ़ने से रोके, लेकिन यह भी संभव है कि इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस जारी रहे। अलग देश बनाने के समर्थकों ने पहले ही संकेत दिए हैं कि उनका अभियान केवल एक मतदान तक सीमित नहीं रहेगा।

इस पूरे मामले का असर सिर्फ अल्बर्टा तक सीमित नहीं है। यह कनाडा में केंद्र और प्रांतों के अधिकारों, प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण और देश की राष्ट्रीय एकता से जुड़े बड़े सवाल खड़े करता है।

फिलहाल सबसे अहम बात यही है कि अल्बर्टा ने कनाडा से अलग होने का अंतिम फैसला नहीं किया है। मतदान का सवाल यह था कि क्या भविष्य में अलगाव पर एक बाध्यकारी जनमत संग्रह कराने की कानूनी प्रक्रिया शुरू की जाए। आगे क्या होगा, यह नतीजों और उसके बाद की संवैधानिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।

इसलिए नतीजों के बारे में कोई अंतिम दावा करने से पहले आधिकारिक आंकड़ों का इंतजार करना जरूरी है।

✓ संपादकीय जाँच: प्रूफ़रीडिंग DP Singh · प्रकाशन की मंज़ूरी DP Singh · हमारे मानक

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