फ्रांस में महंगाई और शिक्षा के मुद्दे पर बड़ा प्रदर्शन, पेरिस में पुलिस से झड़प
फ्रांस में स्कूलों की बदहाली, महंगाई और बढ़ते खर्च के खिलाफ 4.10 लाख से ज्यादा लोग सड़कों पर उतरे। पेरिस में प्रदर्शन के अंत में पुलिस और कुछ प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई, जबकि देशभर में सुरक्षा कड़ी कर दी गई।
फ्रांस में शिक्षा व्यवस्था, बढ़ती महंगाई और आम लोगों के खर्च से जुड़े मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन तेज हो गया है। शनिवार को देशभर में 4.10 लाख से ज्यादा लोग सड़कों पर उतरे। राजधानी पेरिस में प्रदर्शन शांतिपूर्ण तरीके से शुरू हुआ, लेकिन मार्च खत्म होने के करीब कुछ प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर चीजें फेंकीं। इसके बाद पुलिस ने आंसू गैस छोड़ी और भीड़ को हटाने के लिए वाटर कैनन का इस्तेमाल किया।
फ्रांस के गृह मंत्रालय के मुताबिक, देशभर में करीब 4,10,000 लोगों ने प्रदर्शन किया, जिनमें से 1,10,000 लोग पेरिस में शामिल हुए। यह प्रदर्शन राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सरकार के लिए एक नई चुनौती बन गया है। खास बात यह है कि मैक्रों के राष्ट्रपति कार्यकाल के अंतिम महीनों में यह आंदोलन और तेज होता दिखाई दे रहा है।
प्रदर्शन क्यों हो रहे हैं?
इस आंदोलन की शुरुआत पिछले महीने पेरिस के दक्षिण-पूर्व में स्थित एक हाईस्कूल में कर्मचारियों की कमी के विरोध से हुई थी। धीरे-धीरे यह मुद्दा पूरे देश में फैल गया। अब इसमें छात्र, शिक्षक, कर्मचारी और ट्रेड यूनियन भी शामिल हो गए हैं।
छात्र बेहतर स्कूल, ज्यादा शिक्षक और उच्च शिक्षा में अधिक सीटों की मांग कर रहे हैं। वहीं, कामगार बेहतर वेतन और पेंशन की मांग उठा रहे हैं। बढ़ती महंगाई और रोजमर्रा की जरूरतों पर होने वाला खर्च भी लोगों की नाराजगी की बड़ी वजह है।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि सरकार को केवल आश्वासन देने के बजाय ठोस कदम उठाने चाहिए।
पेरिस में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प
पेरिस में प्रशासन ने मार्च का रास्ता शहर के दक्षिण-पूर्वी हिस्से तक सीमित रखा था। इसका मकसद प्रदर्शनकारियों को उन केंद्रीय इलाकों से दूर रखना था, जहां पिछले सप्ताह हिंसा, तोड़फोड़ और लूटपाट हुई थी।
लेकिन मार्च के अंतिम पड़ाव, पोर्ते द विन्सेन के पास स्थिति बिगड़ गई। कुछ लोगों ने पुलिस की ओर चीजें फेंकीं, जिसके बाद पुलिस ने आंसू गैस और वाटर कैनन का इस्तेमाल किया।
पेरिस अभियोजन कार्यालय के मुताबिक, शनिवार के प्रदर्शन से जुड़े मामले में 64 लोगों को गिरफ्तार किया गया और 40 लोगों को पुलिस हिरासत में रखा गया। गिरफ्तार लोगों में छह नाबालिग भी शामिल थे। अधिकारियों ने बताया कि ज्यादातर गिरफ्तारियां हथियार रखने के संदेह या हिंसा और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की तैयारी करने वाले समूह में शामिल होने के आरोपों से जुड़ी थीं।
देश के दूसरे शहरों में भी तनाव की खबरें आईं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, लियोन, क्लेरमों-फेरां और स्ट्रासबर्ग में पुलिस ने आंसू गैस का इस्तेमाल किया, जबकि नीस और नांत में वाटर कैनन का इस्तेमाल किया गया। मार्सेई में भी प्रदर्शन के दौरान पुलिस और कुछ लोगों के बीच झड़प हुई।
सरकार ने 70 हजार सुरक्षाकर्मी तैनात किए
पिछले सप्ताह हुई हिंसा के बाद फ्रांस सरकार इस बार सुरक्षा को लेकर ज्यादा सतर्क थी। गृह मंत्री लॉरां नुनेज ने देशभर में 70,000 तक पुलिसकर्मियों और अन्य सुरक्षा बलों की तैनाती की घोषणा की थी। जरूरत के मुताबिक हेलिकॉप्टर, बख्तरबंद वाहन और वाटर कैनन भी तैयार रखे गए।
पिछले सप्ताह आधे मिलियन से ज्यादा लोग सड़कों पर उतरे थे। उस दौरान हिंसा और लूटपाट के बीच फ्रांसभर में करीब 3,000 दुकानों को नुकसान पहुंचने या लूटे जाने की खबरें आई थीं।
गृह मंत्री नुनेज ने सोमवार को स्वीकार किया था कि पिछले सप्ताह कुछ शहरों में पुलिस स्थिति पर नियंत्रण खो बैठी थी। उन्होंने इस्तीफे की पेशकश भी की, लेकिन राष्ट्रपति मैक्रों ने उसे स्वीकार नहीं किया।
इस बार पेरिस में दुकानदारों ने अपनी दुकानों को नुकसान से बचाने के लिए लकड़ी के बोर्ड लगाए। शहर के कई प्रमुख संग्रहालय भी शनिवार को बंद रहे। सुरक्षा चिंताओं के कारण आर्ट बेसल कला मेले का सप्ताहांत कार्यक्रम भी रद्द कर दिया गया।
छात्रों की मांग: ज्यादा सीटें, बेहतर स्कूल और कम खर्च
छात्र संगठनों ने उच्च शिक्षा में 2.5 लाख अतिरिक्त सीटें बनाने की मांग की है। वे Parcoursup नाम की राष्ट्रीय विश्वविद्यालय प्रवेश प्रणाली में चयन प्रक्रिया को खत्म करने की भी मांग कर रहे हैं।
Parcoursup वह व्यवस्था है, जिसके जरिए फ्रांस में छात्र विश्वविद्यालयों और अन्य उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रवेश के लिए आवेदन करते हैं। छात्रों का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था में कई युवाओं को अपनी पसंद की पढ़ाई का मौका नहीं मिल पाता।
छात्र संगठनों की दस सूत्री मांगों में स्कूलों और विश्वविद्यालयों में ज्यादा शिक्षक नियुक्त करना, खराब इमारतों की मरम्मत करना और शिक्षा व्यवस्था में सुधार करना शामिल है।
इसके अलावा, छात्र हर महीने 200 यूरो अतिरिक्त छात्र सहायता और सरकारी छात्र आवासों के किराये पर रोक लगाने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि पढ़ाई के साथ रहने और खाने का खर्च उठाना भी मुश्किल होता जा रहा है।
शिक्षा व्यवस्था की समस्या कितनी गंभीर है?
फ्रांस के शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 के शैक्षणिक सत्र में शिक्षकों की अनुपस्थिति के कारण, उनकी जगह दूसरे शिक्षक उपलब्ध नहीं कराए जाने से सरकारी मिडिल और हाईस्कूलों में कुल 1.54 करोड़ शिक्षण घंटे प्रभावित हुए। यह निर्धारित शिक्षण समय का 7.5 प्रतिशत था।
इस आंकड़े से समझा जा सकता है कि शिक्षकों की कमी और अनुपस्थिति छात्रों की पढ़ाई पर कितना असर डाल सकती है।
राष्ट्रपति मैक्रों ने शुक्रवार को हाईस्कूल के प्रतिनिधियों से मुलाकात की थी। छात्रों के प्रतिनिधियों के मुताबिक, मैक्रों ने विश्वविद्यालय प्रवेश व्यवस्था में बदलाव का आश्वासन दिया। लेकिन छात्रों ने कहा कि जब तक ठोस फैसले सामने नहीं आते, तब तक आंदोलन जारी रहना चाहिए।
महंगाई ने भी बढ़ाई लोगों की परेशानी
प्रदर्शन केवल स्कूलों और विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं है। लोगों की जेब पर पड़ रहा दबाव भी आंदोलन की बड़ी वजह है।
फ्रांस की राष्ट्रीय सांख्यिकी एजेंसी INSEE के मुताबिक, सितंबर में ऊर्जा की कीमतें एक साल पहले की तुलना में 21.3 प्रतिशत ज्यादा थीं। इसी दौरान कुल महंगाई दर 3.1 प्रतिशत तक पहुंच गई थी।
ऊर्जा महंगी होने का असर बिजली, परिवहन और दूसरी जरूरी सेवाओं के खर्च पर पड़ सकता है। ऐसे में कम आय वाले परिवारों और छात्रों के लिए रोजमर्रा का खर्च संभालना और कठिन हो जाता है।
प्रदर्शन में शामिल 27 वर्षीय इंजीनियरिंग और मास्टर डिग्री धारक कैमिल शेनियर ने कहा कि इतनी पढ़ाई करने के बावजूद उन्हें नौकरी नहीं मिल पा रही है। उन्होंने बताया कि उनके जैसे कई लोग हैं, जिनके पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं और जिन्हें रहने तक के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।
पेरिस में प्रदर्शन कर रहीं शिक्षिका बेनेडिक्ट पिटियॉन अपनी 16 वर्षीय बेटी के साथ मार्च में शामिल हुईं। उनका कहना था कि प्रदर्शन कर रहे युवाओं की बात नहीं सुनी जा रही है। उनकी बेटी ने भी कहा कि पिछले सप्ताह की हिंसा की तस्वीरें देखकर वह डरी हुई थी, लेकिन प्रदर्शन से दूर रहने पर उसे लगा कि इससे सरकार को फायदा होगा।
मैक्रों सरकार के सामने राजनीतिक चुनौती
इस आंदोलन का असर फ्रांस की राजनीति पर भी पड़ सकता है। मैक्रों का कार्यकाल अपने अंतिम चरण में है और अगले राष्ट्रपति चुनाव में मतदाता उनके उत्तराधिकारी का चुनाव करेंगे।
दक्षिणपंथी नेशनल रैली पार्टी ने सरकार पर जनता की सुरक्षा और देश की समस्याओं को ठीक से संभालने में नाकाम रहने का आरोप लगाया है। पार्टी लोगों से अपनी नाराजगी को वोट के जरिए जाहिर करने की अपील कर रही है।
इस बीच, ट्रेड यूनियनों ने कई शहरों में प्रदर्शन पर लगाए गए प्रतिबंधों की आलोचना की है। उनका कहना है कि ऐसे प्रतिबंध अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करते हैं, जिसे फ्रांस का संविधान संरक्षण देता है।
‘येलो वेस्ट’ आंदोलन से जुड़े आयोजकों ने 31 अक्टूबर को एक और प्रदर्शन का आह्वान किया है। उनका कहना है कि लोगों को विरोध करने का अधिकार मिलना चाहिए।
आगे क्या हो सकता है?
फ्रांस में यह आंदोलन अब केवल एक स्कूल या किसी एक वर्ग की समस्या नहीं रह गया है। इसमें शिक्षा, रोजगार, वेतन, पेंशन, महंगाई और आम लोगों के जीवन स्तर से जुड़े कई मुद्दे एक साथ सामने आ रहे हैं।
सरकार के सामने चुनौती दोहरी है। उसे सार्वजनिक संपत्ति और लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी है, लेकिन साथ ही शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वालों की मांगों को भी सुनना होगा।
फिलहाल, छात्र और ट्रेड यूनियन ठोस फैसलों की मांग कर रहे हैं। अगर सरकार उनकी अपेक्षाओं पर खरा उतरने में नाकाम रहती है, तो आने वाले दिनों में विरोध प्रदर्शन जारी रह सकते हैं। वहीं, पिछले सप्ताह हुई हिंसा को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था और प्रदर्शन के अधिकार के बीच संतुलन बनाए रखना भी सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगी।
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