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होर्मुज में जहाज पर विस्फोट, ईरान ने अमेरिका को ठहराया जिम्मेदार; सऊदी अरब पर भी हमले तेज

पश्चिम एशिया में युद्ध और तनाव के बीच ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा को लेकर अमेरिका पर आरोप लगाए हैं। दूसरी ओर, जहाजों में आग लगने, सऊदी अरब पर हमलों और मिस्र के समर्थन से क्षेत्रीय संकट गहराता दिख रहा है।

होर्मुज में जहाज पर विस्फोट, ईरान ने अमेरिका को ठहराया जिम्मेदार; सऊदी अरब पर भी हमले तेज

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध का असर अब समुद्र के रास्तों, तेल की सप्लाई और कई देशों की सुरक्षा पर दिखाई दे रहा है। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव कम होने के बजाय लगातार बढ़ रहा है। इसी बीच ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने कहा है कि क्षेत्र की समस्याओं का समाधान युद्ध से नहीं, बल्कि बातचीत और कूटनीति से निकाला जाना चाहिए। उन्होंने होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ती असुरक्षा के लिए अमेरिका को जिम्मेदार ठहराया है।

यह बयान उन्होंने सोमवार, 19 अक्टूबर को तेहरान में रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के साथ संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिया। अराघची ने यह भी कहा कि क्षेत्रीय देशों को अपनी सुरक्षा के लिए मिलकर व्यवस्था बनानी चाहिए। उनका कहना था कि सुरक्षा ऐसी होनी चाहिए, जिसमें क्षेत्र के देशों की भूमिका हो और बाहरी सैन्य बलों पर निर्भरता कम हो।

लेकिन इसी समय समुद्र में जहाजों पर हमले और आग लगने की घटनाएं सामने आ रही हैं। ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने दावा किया कि होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री बारूदी सुरंग से टकराने के बाद तेल टैंकरों में आग लग गई। ईरानी पक्ष ने आरोप लगाया कि जहाज तय नियमों के खिलाफ रास्ते से गुजर रहे थे।

इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए तीन सवाल अहम हैं—होर्मुज जलडमरूमध्य इतना महत्वपूर्ण क्यों है, ईरान इसे फिर खोलने की बात क्यों कर रहा है और सऊदी अरब पर हो रहे हमलों से पूरे क्षेत्र की स्थिति पर क्या असर पड़ सकता है?

होर्मुज जलडमरूमध्य क्या है और इतना महत्वपूर्ण क्यों है?

होर्मुज जलडमरूमध्य समुद्र का एक संकरा रास्ता है, जो फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। ईरान इसके उत्तर में है, जबकि ओमान और संयुक्त अरब अमीरात इसके दक्षिणी क्षेत्र के पास स्थित हैं।

इस रास्ते की अहमियत इसलिए है क्योंकि खाड़ी के कई बड़े तेल उत्पादक देशों से दुनिया के दूसरे हिस्सों तक तेल और गैस पहुंचाने वाले जहाज इसी मार्ग से गुजरते हैं। युद्ध से पहले दुनिया में इस्तेमाल होने वाले तेल का लगभग पांचवां हिस्सा इस जलडमरूमध्य से होकर गुजरता था।

अब सोचिए, अगर इस रास्ते से जहाजों की आवाजाही रुक जाए या बहुत कम हो जाए, तो क्या होगा? तेल की सप्लाई प्रभावित हो सकती है, जहाजों को दूसरे रास्ते तलाशने पड़ सकते हैं और परिवहन का खर्च बढ़ सकता है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों पर दबाव पड़ सकता है।

भारत जैसे देश के लिए भी यह महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात किए जाने वाले कच्चे तेल से पूरा करता है। अगर लंबे समय तक सप्लाई बाधित रहती है और अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ती हैं, तो इसका असर पेट्रोल-डीजल की लागत, माल ढुलाई और महंगाई पर पड़ सकता है। हालांकि, इसका वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि संकट कितने समय तक चलता है और तेल की सप्लाई के दूसरे विकल्प कितने उपलब्ध रहते हैं।

यही वजह है कि होर्मुज में जहाजों की सुरक्षा केवल ईरान या अमेरिका का मामला नहीं है। इसका असर दुनिया की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

समुद्री बारूदी सुरंग से टकराने पर क्या होता है?

ईरान की रिवोल्यूशनरी गार्ड्स ने दावा किया है कि होर्मुज में तेल टैंकर समुद्री बारूदी सुरंगों से टकराए और उनमें आग लग गई। ईरानी सरकारी मीडिया ने इस घटना से जुड़ा वीडियो भी प्रसारित किया।

समुद्री बारूदी सुरंग पानी के भीतर या उसके आसपास लगाई जाने वाली विस्फोटक डिवाइस होती है। जब कोई जहाज उसके संपर्क में आता है या उसके पास से गुजरता है, तो विस्फोट हो सकता है। इससे जहाज के ढांचे को नुकसान पहुंच सकता है, आग लग सकती है और तेल समुद्र में फैलने का खतरा पैदा हो सकता है।

हालांकि, इस मामले में एक जरूरी बात समझनी चाहिए। जहाजों में आग लगने और बारूदी सुरंग से टकराने की जानकारी ईरानी अधिकारियों की ओर से दी गई है। जहाजों की पहचान, घटना की पूरी परिस्थितियों और जिम्मेदारी से जुड़े सभी दावों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।

ईरान का कहना है कि जहाज बिना अनुमति वाले रास्ते से गुजर रहे थे और उन्होंने अपनी स्थिति बताने वाले सिस्टम बंद कर रखे थे। दूसरी ओर, इस तरह के आरोपों की जांच के लिए समुद्री सुरक्षा से जुड़े स्वतंत्र सबूत और जहाजों के रिकॉर्ड भी अहम होते हैं।

यानी घटना गंभीर है, लेकिन किसी एक पक्ष के बयान को ही पूरी तरह प्रमाणित निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।

ईरान अमेरिका पर आरोप क्यों लगा रहा है?

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची का कहना है कि होर्मुज में असुरक्षा और तनाव के लिए अमेरिका जिम्मेदार है। ईरान का तर्क है कि विदेशी सैन्य मौजूदगी और दबाव की नीति से क्षेत्र में तनाव बढ़ता है। इसी कारण वह चाहता है कि खाड़ी के देश अपनी सुरक्षा व्यवस्था खुद तैयार करें।

रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के साथ बातचीत में अराघची ने क्षेत्रीय देशों के बीच साझा सुरक्षा व्यवस्था बनाने की अपील की। इसका मतलब यह है कि ईरान चाहता है कि इलाके के देश आपसी सहयोग से समुद्री रास्तों और क्षेत्रीय सुरक्षा के मामलों को संभालें।

लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच विवाद केवल समुद्री रास्ते तक सीमित नहीं है। दोनों के बीच सैन्य कार्रवाई, प्रतिबंधों, तेल व्यापार और ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी मतभेद हैं। इन मुद्दों ने बातचीत की गुंजाइश को जटिल बना दिया है।

यहां यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अमेरिका और ईरान एक-दूसरे पर आरोप लगाते रहे हैं। किसी घटना के लिए जिम्मेदारी तय करने के लिए स्वतंत्र जांच और उपलब्ध सबूतों को देखना जरूरी है।

होर्मुज को सात दिन में खोलने का ईरान का प्रस्ताव क्या है?

ईरान के विदेश मंत्री ने इससे पहले अमेरिका के सामने एक प्रस्ताव रखा था। इस प्रस्ताव के मुताबिक, अगर अमेरिका ईरान की निर्धारित शर्तें मान लेता है, तो होर्मुज जलडमरूमध्य को सात दिनों के भीतर खोलने और आगे बातचीत शुरू करने का रास्ता बन सकता है।

ईरान की शर्तों में अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी खत्म करना, तेल से जुड़े प्रतिबंधों में राहत और युद्धविराम जैसे मुद्दे शामिल बताए गए हैं। तेहरान का कहना है कि प्रस्ताव अभी भी मौजूद है।

हालांकि, इसका यह मतलब नहीं है कि जलडमरूमध्य खोलने पर समझौता हो चुका है या जहाजों की आवाजाही सामान्य हो गई है। प्रस्ताव को लागू करने के लिए दोनों पक्षों के बीच सहमति और शर्तों पर समझौता जरूरी है।

इस समय सबसे बड़ी बाधा दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी है। ईरान प्रतिबंधों और सैन्य दबाव में राहत चाहता है, जबकि अमेरिका व्यापक सुरक्षा मुद्दों पर समझौता चाहता है। जब तक दोनों पक्ष अपनी शर्तों पर सहमति नहीं बनाते, तब तक प्रस्ताव का वास्तविक परिणाम स्पष्ट नहीं होगा।

ईरान ने नए रक्षा मंत्री को मंजूरी क्यों दी?

इसी बीच ईरान की संसद ने मेहरदाद अखलाघी केताबची को नया रक्षा मंत्री नियुक्त करने की मंजूरी दी है। यह नियुक्ति ऐसे समय हुई है, जब देश युद्ध और सुरक्षा से जुड़ी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है।

केताबची लंबे समय से ईरान के रक्षा उद्योग से जुड़े रहे हैं और एयरोस्पेस तथा मिसाइल विकास के क्षेत्र में काम कर चुके हैं। संसद से मंजूरी मिलने के बाद उन्होंने देश की रक्षा उत्पादन क्षमता और सैन्य तकनीक को मजबूत करने की बात कही।

इस नियुक्ति का महत्व इसलिए है क्योंकि युद्ध के दौरान रक्षा मंत्रालय की भूमिका केवल सेना के संचालन तक सीमित नहीं रहती। हथियारों का उत्पादन, रक्षा तकनीक का विकास और सैन्य उपकरणों की उपलब्धता भी अहम हो जाती है।

हालांकि, नए रक्षा मंत्री की नियुक्ति अपने आप में यह साबित नहीं करती कि ईरान युद्ध को और बढ़ाना चाहता है। यह नियुक्ति युद्ध के दौरान रक्षा व्यवस्था को संभालने और मजबूत करने के प्रयास के रूप में भी देखी जा सकती है। आगे की दिशा ईरान के फैसलों और दूसरे देशों के साथ उसके संबंधों पर निर्भर करेगी।

सऊदी अरब पर हमले और मिस्र का समर्थन

पश्चिम एशिया का संकट केवल ईरान और अमेरिका तक सीमित नहीं है। यमन में सक्रिय हूती विद्रोहियों के हमलों से सऊदी अरब की सुरक्षा भी प्रभावित हो रही है।

सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने बताया कि उसने रियाद और देश के अन्य क्षेत्रों की ओर आ रहे कई ड्रोन और बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकने का दावा किया है। यमन की सीमा के पास नज़रान क्षेत्र में एक सैन्य हेलीकॉप्टर दुर्घटना में दो सैनिकों की मौत की भी खबर सामने आई। इस दुर्घटना की वजह को लेकर अलग-अलग दावे किए गए हैं।

इन घटनाओं के बीच मिस्र ने सऊदी अरब की सुरक्षा के लिए हर जरूरी और संभव समर्थन देने की घोषणा की है। मिस्र की राष्ट्रीय रक्षा परिषद ने कहा कि वह सऊदी अरब की सुरक्षा और स्थिरता के समर्थन में खड़ी है। साथ ही, मिस्र ने कूटनीतिक प्रयासों के जरिए तनाव कम करने की बात भी कही है।

लेकिन मिस्र की ओर से समर्थन की घोषणा को सीधे सैन्य कार्रवाई शुरू होने के बराबर नहीं समझना चाहिए। किसी देश में सेना भेजने या किसी खास सैन्य अभियान में शामिल होने के लिए अलग निर्णय और प्रक्रियाएं जरूरी हो सकती हैं।

यदि सऊदी अरब पर हमले जारी रहते हैं और दूसरे देश भी सुरक्षा के नाम पर अधिक सक्रिय होते हैं, तो संघर्ष का दायरा बढ़ने का खतरा बना रहेगा। इससे तेल के रास्तों, व्यापार और क्षेत्रीय स्थिरता पर और दबाव पड़ सकता है।

क्या पश्चिम एशिया में युद्ध और फैल सकता है?

फिलहाल सबसे बड़ी चिंता यही है कि क्या समुद्री हमले, मिसाइल और ड्रोन हमले तथा सैन्य तैयारियां एक बड़े क्षेत्रीय संघर्ष में बदल सकती हैं।

इसके कई कारण हैं। पहला, होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते पर तनाव है। दूसरा, ईरान और अमेरिका के बीच भरोसे की कमी के कारण कूटनीतिक समझौता आसान नहीं है। तीसरा, यमन में हूती विद्रोहियों के हमलों से सऊदी अरब भी प्रभावित हो रहा है और मिस्र ने उसके समर्थन का ऐलान किया है।

इसके बावजूद यह कहना जल्दबाजी होगी कि पूरा क्षेत्र एक बड़े युद्ध की ओर बढ़ ही रहा है। कूटनीतिक बातचीत और संघर्ष कम करने की कोशिशें अभी भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। ईरान का सात दिन वाला प्रस्ताव भी दिखाता है कि बातचीत का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं हुआ है, हालांकि उस पर सहमति बनना अभी बाकी है।

भारत और आम लोगों पर क्या असर पड़ सकता है?

भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा तेल की सप्लाई और उसकी कीमतें हैं। अगर होर्मुज से तेल के जहाजों की आवाजाही लंबे समय तक बाधित रहती है, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ सकती हैं। इससे भारत का आयात बिल बढ़ने और अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ने की आशंका हो सकती है।

महंगे तेल का असर माल ढुलाई, हवाई यात्रा और कई उद्योगों की लागत पर भी पड़ सकता है। हालांकि, घरेलू पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कितना बदलाव होगा, यह अंतरराष्ट्रीय बाजार के साथ-साथ रुपये की विनिमय दर, सरकारी करों और दूसरे आर्थिक फैसलों पर भी निर्भर करता है।

इसलिए फिलहाल स्थिति पर नजर रखना जरूरी है, लेकिन किसी भी संभावित असर को निश्चित परिणाम की तरह पेश करना सही नहीं होगा।

फिलहाल सबसे अहम बात क्या है?

ईरान ने एक ओर कूटनीति और क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था की बात की है, तो दूसरी ओर होर्मुज में जहाजों पर आग लगने की घटनाओं और सऊदी अरब पर हमलों ने तनाव बढ़ा दिया है। ईरान का सात दिन में जलडमरूमध्य खोलने का प्रस्ताव बातचीत की एक संभावित राह दिखाता है, लेकिन इसे लागू करने के लिए अमेरिका और ईरान के बीच सहमति जरूरी है।

आने वाले दिनों में तीन बातों पर नजर रहेगी—क्या दोनों देश बातचीत की दिशा में आगे बढ़ते हैं, क्या होर्मुज में जहाजों की आवाजाही सुरक्षित होती है और क्या सऊदी अरब पर हमले कम होते हैं।

इन सवालों के जवाब तय करेंगे कि पश्चिम एशिया तनाव कम करने की ओर बढ़ता है या संकट और गहरा होता है।

✓ संपादकीय जाँच: प्रूफ़रीडिंग DP Singh · प्रकाशन की मंज़ूरी DP Singh · हमारे मानक

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