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इजरायल की राजनीति में अरब दल क्यों बने किंगमेकर? 2026 के चुनाव ने बदल दिया सत्ता का गणित

इजरायल के 2026 के चुनाव में अरब नेतृत्व वाली पार्टियों ने 19 सीटें जीतकर सरकार गठन की राजनीति में अहम जगह बना ली है। जानिए इस समुदाय का इतिहास, राजनीतिक संघर्ष और बढ़ती भूमिका।

इजरायल की राजनीति में अरब दल क्यों बने किंगमेकर? 2026 के चुनाव ने बदल दिया सत्ता का गणित

इजरायल की राजनीति में इन दिनों एक ऐसा सवाल चर्चा में है, जो कुछ साल पहले तक इतना अहम नहीं माना जाता था। सवाल यह है कि क्या देश का अरब समुदाय अब सरकार बनाने और गिराने की राजनीति में निर्णायक भूमिका निभा सकता है?

27 अक्टूबर 2026 को हुए संसदीय चुनाव के नतीजों ने इस सवाल को और महत्वपूर्ण बना दिया है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी 27 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई, लेकिन उनके समर्थन वाले दक्षिणपंथी गठबंधन को कुल 53 सीटें मिलीं। दूसरी ओर, गादी आइजनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी खेमे को 48 सीटें मिलीं। अरब नेतृत्व वाली पार्टियों ने मिलकर 19 सीटें हासिल कीं।

इजरायल की संसद में कुल 120 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी है। इस चुनाव में कोई भी खेमा अपने दम पर बहुमत तक नहीं पहुंच पाया। ऐसे में अरब दलों का समर्थन सरकार गठन की बातचीत में महत्वपूर्ण हो गया है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि ये पार्टियां एक साथ किसी एक गठबंधन का समर्थन करेंगी या सरकार में शामिल होना तय है।

पहले समझिए, इजरायल का अरब समुदाय कौन है?

इजरायल को आमतौर पर यहूदी बहुल देश के रूप में जाना जाता है। यहां यहूदी आबादी बहुसंख्यक है, लेकिन देश में अरब नागरिक भी रहते हैं। वे कुल आबादी का लगभग पांचवां हिस्सा हैं।

इनमें मुस्लिम, ईसाई और द्रूज समुदायों के लोग शामिल हैं। इस समुदाय को एक ही राजनीतिक विचारधारा या एक ही पार्टी से जोड़कर देखना सही नहीं होगा। इनके बीच धर्म, पहचान, राजनीतिक सोच और इजरायल-फलस्तीन मुद्दे को लेकर अलग-अलग विचार हैं।

इजरायल के अरब नागरिकों में ऐसे परिवार भी हैं, जिनकी जड़ें 1948 में इजरायल के गठन से पहले इसी क्षेत्र में थीं और जो देश की स्थापना के बाद उसकी सीमाओं के भीतर रह गए। उन्हें इजरायल की नागरिकता मिली और वे देश की संसदीय चुनाव प्रक्रिया में हिस्सा लेने लगे।

1947 में संयुक्त राष्ट्र ने क्या फैसला किया था?

इजरायल और वहां के अरब समुदाय के इतिहास को समझने के लिए 1947 में जाना जरूरी है।

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद यहूदियों के लिए एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाने की मांग तेज हुई। उस समय फलस्तीन क्षेत्र ब्रिटिश शासन के अधीन था। इस क्षेत्र में यहूदी और अरब दोनों समुदाय रहते थे।

29 नवंबर 1947 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने प्रस्ताव 181 पारित किया। इसके तहत ब्रिटिश शासन वाले फलस्तीन क्षेत्र को दो स्वतंत्र राज्यों में बांटने की योजना रखी गई थी—एक यहूदी राज्य और दूसरा अरब राज्य। यरुशलम के लिए अलग अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का प्रस्ताव भी था।

यह योजना विवादों से घिरी रही। यहूदी नेतृत्व ने इसे स्वीकार किया, जबकि अरब नेतृत्व ने इसका विरोध किया। इसके बाद क्षेत्र में संघर्ष बढ़ा।

14 मई 1948 को इजरायल की स्वतंत्रता की घोषणा हुई। इसके तुरंत बाद अरब-इजरायल युद्ध शुरू हो गया। युद्ध और उसके बाद हुए क्षेत्रीय बदलावों के कारण बड़ी संख्या में फलस्तीनी अरब अपने घरों से विस्थापित हुए। वहीं, जो अरब आबादी नवगठित इजरायल की सीमाओं के भीतर रह गई, वह आगे चलकर इजरायल की अरब नागरिक आबादी का हिस्सा बनी।

नागरिकता और मतदान का अधिकार मिला, लेकिन हालात आसान नहीं थे

इजरायल के अरब नागरिकों को देश के शुरुआती संसदीय चुनावों से ही मतदान का अधिकार मिला। 1949 में हुए पहले चुनाव में भी अरब नागरिकों ने हिस्सा लिया।

लेकिन नागरिकता और मतदान का अधिकार मिलने का मतलब यह नहीं था कि उनके सामने मौजूद सभी मुश्किलें खत्म हो गई थीं।

1948 से 1966 तक अरब आबादी वाले इलाकों में सैन्य प्रशासन लागू रहा। इस दौरान आवाजाही और रोजमर्रा के जीवन पर कई तरह के प्रतिबंध थे। इजरायल डेमोक्रेसी इंस्टीट्यूट के शोध के अनुसार, इस सैन्य प्रशासन का असर अरब नागरिकों की राजनीतिक भागीदारी और चुनावी व्यवहार पर भी पड़ा।

यानी एक तरफ अरब नागरिकों को मतदान का अधिकार मिला हुआ था, तो दूसरी तरफ उनके राजनीतिक और सामाजिक जीवन पर कई सीमाएं भी थीं। यही वजह है कि इजरायल की राजनीति में उनकी शुरुआती भागीदारी को समझने के लिए इस दौर को जानना जरूरी है।

शुरुआत में अरब नेता स्वतंत्र राजनीतिक ताकत क्यों नहीं बन पाए?

इजरायल की पहली संसद यानी नेसेट में अरब प्रतिनिधि पहुंचे, लेकिन शुरुआती दौर में उनकी राजनीतिक पहचान काफी हद तक यहूदी बहुल मुख्यधारा की पार्टियों से जुड़ी सूचियों पर निर्भर थी।

उस समय मैपाई जैसी प्रमुख पार्टी से संबद्ध अरब सूचियों के जरिए कई प्रतिनिधि संसद तक पहुंचे। इन सूचियों के पास अपनी स्वतंत्र राजनीतिक नीति बनाने की सीमित गुंजाइश थी और वे अक्सर मुख्य पार्टी की राजनीतिक दिशा के साथ चलती थीं।

इसके अलावा, इजरायल की कम्युनिस्ट पार्टी में यहूदी और अरब दोनों समुदायों के नेता और कार्यकर्ता शामिल थे। इसने भी अरब नागरिकों को राजनीति में अपनी आवाज उठाने का एक मंच दिया।

1970 और 1980 के दशक में कैसे बदली राजनीति?

समय के साथ अरब नागरिकों के बीच स्वतंत्र राजनीतिक पहचान की मांग बढ़ने लगी। 1970 के दशक में पुराने राजनीतिक ढांचे का प्रभाव कम हुआ और नए संगठनों तथा दलों का विकास हुआ।

1977 में हदाश यानी डेमोक्रेटिक फ्रंट फॉर पीस एंड इक्वालिटी की स्थापना हुई। यह अरब और यहूदी वामपंथी कार्यकर्ताओं के साझा राजनीतिक मंच के रूप में सामने आया।

इसके बाद अलग-अलग विचारधाराओं वाले अरब राजनीतिक संगठन मजबूत हुए। कुछ दलों ने यहूदी और अरब समुदायों के बीच सहयोग को प्राथमिकता दी, तो कुछ ने फलस्तीनी राष्ट्रीय पहचान और अधिकारों को अपने राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा बनाया।

1990 के दशक में बलद और राअम जैसे राजनीतिक मंच भी सामने आए। इससे इजरायल की अरब राजनीति में अलग-अलग विचारों और रणनीतियों को जगह मिली।

इजरायल की संसद में सरकार कैसे बनती है?

अब इस राजनीतिक गणित को आसान भाषा में समझिए।

इजरायल की संसद को नेसेट कहा जाता है। इसमें कुल 120 सदस्य होते हैं। देश में आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली लागू है। इसका मतलब है कि चुनाव में पार्टियों को मिले वोटों के अनुपात के आधार पर उन्हें संसद में सीटें मिलती हैं।

सरकार बनाने के लिए किसी एक पार्टी या गठबंधन को कम से कम 61 सांसदों का समर्थन चाहिए। इसलिए अक्सर वहां एक से अधिक पार्टियां मिलकर गठबंधन सरकार बनाती हैं।

इजरायल में कोई एक पार्टी अकेले बहुमत हासिल नहीं कर पाती, ऐसा कहना पूरी तरह सटीक नहीं होगा। सही बात यह है कि वहां गठबंधन सरकारों की परंपरा रही है और सरकार बनाने के लिए कई पार्टियों के बीच समझौते की जरूरत पड़ती है।

यही व्यवस्था छोटी पार्टियों को भी महत्वपूर्ण बना देती है। यदि किसी बड़े गठबंधन के पास बहुमत से कुछ सीटें कम हैं, तो छोटी पार्टियों का समर्थन सरकार गठन का रास्ता खोल सकता है।

राअम और ज्वाइंट लिस्ट की भूमिका क्या है?

इजरायल की अरब राजनीति में दो प्रमुख नाम अक्सर चर्चा में रहते हैं—राअम और ज्वाइंट लिस्ट।

राअम (United Arab List): यह अरब इस्लामी राजनीतिक धारा का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टी है। इसके नेता मंसूर अब्बास हैं। राअम ने 2021 में एक बड़ा राजनीतिक कदम उठाया था, जब उसने नफ्ताली बेनेट और यायर लैपिड के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार को समर्थन दिया। इस तरह उसने दिखाया कि अरब पार्टी भी सरकार बनाने की प्रक्रिया में सीधे भागीदारी कर सकती है।

ज्वाइंट लिस्ट (Joint List): यह अलग-अलग अरब राजनीतिक दलों का गठबंधन रहा है। इसमें हदाश, ताअल और बलद जैसे दल अलग-अलग समय पर साथ आए। इसका उद्देश्य अरब मतदाताओं की राजनीतिक आवाज को एक मजबूत संसदीय मंच देना था। हालांकि, इन दलों के बीच विचारधारात्मक मतभेद भी रहे हैं।

यह समझना जरूरी है कि अरब राजनीतिक दल एक जैसे नहीं हैं। उनके बीच इजरायल की पहचान, फलस्तीन के मुद्दे, सरकार में भागीदारी और स्थानीय समस्याओं को प्राथमिकता देने जैसे विषयों पर अलग-अलग राय है।

2021 में राअम ने कैसे बदला सरकार बनाने का गणित?

अरब दलों की राजनीतिक भूमिका को समझने के लिए 2021 का चुनाव एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।

उस समय इजरायल में नेतन्याहू के समर्थक और विरोधी खेमे के बीच बहुमत को लेकर खींचतान थी। मंसूर अब्बास की राअम पार्टी ने नफ्ताली बेनेट और यायर लैपिड के गठबंधन को समर्थन दिया।

राअम के पास केवल चार सीटें थीं, लेकिन सरकार बनाने के लिए उसके समर्थन की जरूरत पड़ गई। इस तरह पहली बार एक स्वतंत्र अरब पार्टी ने इजरायल की गठबंधन सरकार में इतनी अहम भूमिका निभाई।

राअम ने उस समय अरब समुदाय की रोजमर्रा की समस्याओं—जैसे शिक्षा, विकास, बजट, अपराध और स्थानीय सुविधाओं—को अपनी प्राथमिकताओं में रखा। इससे यह संदेश गया कि अरब पार्टियां केवल पहचान की राजनीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सरकारी नीतियों और संसाधनों के बंटवारे को भी प्रभावित कर सकती हैं।

2026 के चुनाव में 19 सीटों का क्या मतलब है?

अब वापस आते हैं मौजूदा चुनाव पर।

2026 के चुनाव में लिकुड को 27 सीटें मिलीं। नेतन्याहू के समर्थन वाले गठबंधन के पास 53 सीटें हैं। विपक्षी खेमे को 48 सीटें मिली हैं। वहीं, अरब नेतृत्व वाली पार्टियों ने कुल 19 सीटें हासिल की हैं।

यह अरब दलों का अब तक का सबसे बड़ा संयुक्त संसदीय प्रतिनिधित्व बताया जा रहा है। 2022 के चुनाव के बाद उनकी कुल सीटें 10 थीं, जो इस बार बढ़कर 19 हो गईं।

इसका सीधा अर्थ है कि अब सरकार बनाने के लिए दोनों बड़े खेमों को अपने विकल्पों पर नए सिरे से विचार करना पड़ सकता है। विपक्षी खेमे के लिए अरब दलों का समर्थन बहुमत तक पहुंचने का रास्ता बन सकता है। लेकिन इसके लिए सभी संबंधित पार्टियों के बीच सहमति जरूरी होगी।

दूसरी तरफ नेतन्याहू ने अरब दलों के समर्थन पर निर्भर सरकार बनाने से इनकार किया है। कुछ विपक्षी दल भी अरब पार्टियों के साथ गठबंधन को लेकर शर्तें और आपत्तियां रखते हैं। इसलिए 19 सीटें होने के बावजूद सरकार गठन का रास्ता आसान नहीं है।

अरब मतदाता किन मुद्दों को लेकर राजनीति में सक्रिय हैं?

अरब समुदाय की राजनीतिक भागीदारी केवल प्रधानमंत्री चुनने तक सीमित नहीं है। उनके सामने कई ऐसे मुद्दे हैं, जिनका सीधा संबंध रोजमर्रा के जीवन से है।

इनमें प्रमुख हैं:

सुरक्षा और अपराध: अरब आबादी वाले इलाकों में हिंसा और संगठित अपराध पर नियंत्रण।

शिक्षा: स्कूलों, कॉलेजों और शैक्षिक सुविधाओं में सुधार।

बुनियादी ढांचा: सड़कों, आवास, जलापूर्ति और सार्वजनिक सुविधाओं का विकास।

सरकारी बजट: अरब बहुल नगरों और गांवों के लिए पर्याप्त सरकारी धन।

समान अवसर: रोजगार, प्रशासन और सार्वजनिक सेवाओं में समान भागीदारी।

इजरायल डेमोक्रेसी इंस्टीट्यूट के अध्ययन में भी यह सामने आया है कि अरब मतदाताओं के लिए राजनीतिक भागीदारी और उससे मिलने वाले व्यावहारिक लाभ महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। हालांकि, सभी अरब मतदाता एक जैसी राजनीतिक प्राथमिकताएं नहीं रखते।

क्या अरब दल अब इजरायल की सत्ता तय करेंगे?

इसका जवाब है—वे सत्ता गठन को प्रभावित करने की स्थिति में जरूर हैं, लेकिन अंतिम फैसला अभी बाकी है।

2026 के चुनाव ने दिखाया है कि इजरायल की राजनीति में अरब दलों को नजरअंदाज करना पहले से अधिक मुश्किल हो गया है। उनके पास 19 सीटें हैं और दोनों बड़े खेमे बहुमत से दूर हैं।

लेकिन किसी पार्टी का किंगमेकर बनना और सरकार में शामिल होना दो अलग-अलग बातें हैं। सरकार बनाने के लिए राजनीतिक समझौते, साझा कार्यक्रम और दूसरी पार्टियों की सहमति जरूरी होगी।

इजरायल की राजनीति का यह नया समीकरण केवल सीटों का गणित नहीं है। यह इस बात का संकेत भी है कि देश के अरब नागरिक अब अपनी राजनीतिक भागीदारी के जरिए राष्ट्रीय फैसलों को प्रभावित करने की अधिक क्षमता रखते हैं।

आने वाले दिनों में गठबंधन की बातचीत तय करेगी कि अरब दल इस ताकत का इस्तेमाल सरकार में भागीदारी के लिए करते हैं, बाहर से समर्थन देते हैं या विपक्ष में रहकर अपनी भूमिका निभाते हैं। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि 2026 के चुनाव ने इजरायल की राजनीति में अरब समुदाय की अहमियत को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है।

✓ संपादकीय जाँच: प्रूफ़रीडिंग DP Singh · प्रकाशन की मंज़ूरी DP Singh · हमारे मानक

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