चुनाव आयोग के दो आयुक्तों ने अधिकारी की शिकायत की, RTI से सामने आई अहम जानकारी
वरिष्ठ चुनाव अधिकारी मनीष गर्ग के कामकाज को लेकर दो चुनाव आयुक्तों ने कैबिनेट सचिव को पत्र लिखे थे। RTI से पता चला है कि ये पत्र मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यालय और कार्मिक विभाग को भी भेजे गए थे।
चुनाव आयोग के भीतर वरिष्ठ अधिकारियों के कामकाज को लेकर उठे सवालों पर एक नई जानकारी सामने आई है। सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मिले दस्तावेजों के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त मनीष गर्ग को लेकर जो पत्र कैबिनेट सचिव को लिखे थे, उनकी प्रतियां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कार्यालय को भी भेजी गई थीं। इन पत्रों को कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के पास भी भेजा गया था।
इससे पहले हिंदुस्तान टाइम्स ने 3 अक्टूबर को रिपोर्ट किया था कि दोनों चुनाव आयुक्तों के पत्र DoPT को भेजे गए थे। अब RTI से मिले दस्तावेजों में मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यालय को पत्र भेजे जाने की जानकारी भी सामने आई है।
यह पूरा मामला इसलिए अहम है क्योंकि इसमें एक तरफ चुनाव आयोग के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच काम के बंटवारे को लेकर उठे सवाल हैं, तो दूसरी तरफ यह संवैधानिक संस्था की स्वतंत्रता और सरकारी विभागों की भूमिका से जुड़ा मुद्दा भी है।
कैबिनेट सचिवालय ने क्या किया?
पारदर्शिता कार्यकर्ता और सेवानिवृत्त कमोडोर लोकेश बत्रा ने 24 सितंबर को RTI आवेदन देकर पूछा था कि चुनाव आयुक्तों के पत्रों पर क्या कार्रवाई की गई।
दस्तावेजों के मुताबिक, 3 अगस्त को कैबिनेट सचिवालय ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से इन पत्रों पर उनकी राय लेने का प्रस्ताव रखा। अगले दिन, 4 अगस्त को तैयार किए गए एक नोट में कहा गया कि दोनों पत्र चुनाव आयुक्तों ने अपनी व्यक्तिगत हैसियत से लिखे थे। वे चुनाव आयोग की ओर से भेजे गए औपचारिक पत्र नहीं थे।
सचिवालय ने यह चिंता भी जताई कि इस मामले में कोई कदम ऐसा नहीं होना चाहिए, जिसे चुनाव आयोग जैसे संवैधानिक संस्थान के कामकाज में दखल के रूप में देखा जाए। साथ ही, मामले को DoPT के रिकॉर्ड में रखने की सिफारिश की गई, ताकि संबंधित अधिकारी के बारे में भविष्य में कोई निर्णय लेते समय इसे देखा जा सके।
RTI के जवाब में मुख्य रूप से पत्र मिलने की पुष्टि और संबंधित अधिकारियों को भेजे गए पत्राचार का विवरण दिया गया। उपलब्ध दस्तावेजों से किसी अनुशासनात्मक कार्रवाई की पुष्टि नहीं होती।
दोनों चुनाव आयुक्तों ने शिकायत क्यों की थी?
यह विवाद 28 जुलाई को जारी एक कार्य-विभाजन आदेश से जुड़ा है। रिपोर्ट के मुताबिक, मनीष गर्ग को प्रशासनिक विभाग का अतिरिक्त प्रभार दिया गया था। उस समय उप चुनाव आयुक्त भानु प्रकाश येतुरू 9 अगस्त तक छुट्टी पर थे।
दोनों चुनाव आयुक्तों ने 29 जुलाई को कैबिनेट सचिव टी. वी. सोमनाथन को लगभग एक जैसे गोपनीय पत्र लिखे। संधू के पत्र के साथ 28 जुलाई के उस आदेश की प्रति भी भेजी गई थी, जिसमें गर्ग ने अपने और चुनाव आयोग के अन्य अधिकारियों के काम का बंटवारा किया था।
पत्रों में आरोप लगाया गया कि गर्ग ने अपने स्तर पर ऐसा कार्य-विभाजन किया, जिसमें उनके वरिष्ठ या उनके समकक्ष अधिकारियों के काम भी शामिल थे। चुनाव आयुक्तों ने कहा कि इस फैसले से पहले उनसे सलाह नहीं ली गई थी।
विवेक जोशी ने यह भी कहा कि प्रशासनिक विभाग से उन्होंने एक फाइल मांगी थी, लेकिन उन्हें उपलब्ध नहीं कराई गई। दोनों आयुक्तों ने अपने पत्रों में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों से जुड़े 2023 के कानून की धाराओं 18(1) और 18(2) का उल्लेख किया।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये बातें चुनाव आयुक्तों के पत्रों में उठाई गई आपत्तियां हैं। इन्हें अपने आप में किसी अधिकारी के खिलाफ साबित हुआ कदाचार नहीं माना जा सकता।
IT विभाग की फाइलों को लेकर क्या विवाद है?
इस मामले का एक महत्वपूर्ण हिस्सा चुनाव आयोग के सूचना प्रौद्योगिकी (IT) विभाग में फाइलों के आने-जाने की प्रक्रिया है।
हिंदुस्तान टाइम्स की 3 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्तों को इस बात पर आपत्ति थी कि गर्ग ने IT विभाग की फाइलों को भेजने का तरीका बदल दिया था। पहले ये फाइलें IT विभाग की महानिदेशक सीमा खन्ना से संबंधित मामलों में उप चुनाव आयुक्त संजय कुमार के पास जाती थीं। नए कार्य-विभाजन के बाद इस प्रक्रिया में बदलाव हुआ।
इसी IT विभाग की भूमिका को लेकर एक अलग विवाद भी सामने आया था। द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट में दावा किया गया कि नए IT प्रोटोकॉल के कारण मतदाता सूची के डेटाबेस तक उन अधिकारियों की पहुंच प्रभावित हुई, जो मतदाताओं के नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया के लिए जिम्मेदार होते हैं। इनमें निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) भी शामिल हैं।
हालांकि, चुनाव आयोग ने अधिकारियों के बीच मतभेद होने की खबरों को खारिज किया है। आयोग का कहना है कि उसके फैसले नियमों के अनुसार सर्वसम्मति से या बहुमत के आधार पर लिए गए हैं।
यह मामला इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
चुनाव आयोग एक संवैधानिक संस्था है, जिसका काम चुनाव प्रक्रिया की निगरानी करना और उसकी निष्पक्षता सुनिश्चित करना है। इसलिए उसके वरिष्ठ अधिकारियों के बीच काम के बंटवारे, फाइलों की आवाजाही और निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों का महत्व बढ़ जाता है।
इस मामले में तीन अलग-अलग बातें समझना जरूरी है। पहली, दो चुनाव आयुक्तों ने एक वरिष्ठ अधिकारी के कामकाज पर आपत्तियां उठाते हुए कैबिनेट सचिव को पत्र लिखे। दूसरी, RTI से पता चला कि इन पत्रों की प्रतियां मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यालय और DoPT को भेजी गई थीं। तीसरी, चुनाव आयोग ने आंतरिक मतभेदों की खबरों को खारिज करते हुए कहा है कि उसके फैसले नियमों के अनुसार लिए जाते हैं।
फिलहाल, RTI से सामने आई जानकारी मुख्य रूप से पत्राचार और उसे रिकॉर्ड में रखने की प्रक्रिया के बारे में है। इससे यह साबित नहीं होता कि मनीष गर्ग के खिलाफ कोई आरोप जांच में सही पाया गया है या उनके खिलाफ कार्रवाई की गई है। मामले की पूरी तस्वीर समझने के लिए संबंधित अधिकारियों के जवाब और आगे की किसी आधिकारिक कार्रवाई की जानकारी भी जरूरी होगी।
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