बंगाल में ममता दीदी के नेता ने BJP की तारीफ में पढ़े कसीदे, औद्योगिक नीति को बताया सकारात्मक
पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार की नई औद्योगिक नीति पर टीएमसी विधायक मदन मित्रा का बयान चर्चा में है। उन्होंने सरकारी भत्तों पर निर्भरता को टिकाऊ समाधान नहीं बताते हुए उद्योग और रोजगार बढ़ाने पर जोर दिया।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में औद्योगिक विकास और रोजगार का मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। राज्य की भाजपा सरकार की नई औद्योगिक नीति को लेकर तृणमूल कांग्रेस के विधायक मदन मित्रा के बयान ने राजनीतिक हलकों में ध्यान खींचा है। मित्रा ने भाजपा सरकार की औद्योगिक नीति को सकारात्मक और सही दिशा में उठाया गया कदम बताया है। उन्होंने कहा कि केवल लोगों को सरकारी भत्ते देना किसी राज्य की अर्थव्यवस्था के लिए स्थायी समाधान नहीं हो सकता। रोजगार के अवसर पैदा करना और उद्योगों को बढ़ावा देना ज्यादा जरूरी है।
मदन मित्रा ने अपने बयान में कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में सरकार का उद्योगों को प्रोत्साहित करने की दिशा में कदम उठाना सकारात्मक फैसला है। उनके मुताबिक, सरकार को यह समझना होगा कि केवल आर्थिक सहायता या भत्ते बांटने से लोगों की समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। ऐसी व्यवस्था लोगों को लंबे समय तक सरकारी सहायता पर निर्भर बना सकती है, जबकि राज्य को आत्मनिर्भर बनाने के लिए रोजगार और आर्थिक गतिविधियों का विस्तार जरूरी है।
उन्होंने दावा किया कि पश्चिम बंगाल से लगभग एक करोड़ लोग दूसरे राज्यों में जा चुके हैं। मित्रा के अनुसार, मुख्यमंत्री ने इन लोगों से वापस लौटने की अपील की है, लेकिन सवाल यह है कि लौटने के बाद उन्हें रोजगार कहां मिलेगा? उनके बयान का मुख्य जोर इस बात पर था कि लोगों को राज्य में ही काम और बेहतर आर्थिक अवसर उपलब्ध कराना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए।
नई औद्योगिक नीति के केंद्र में निवेश और रोजगार
मदन मित्रा का यह बयान ऐसे समय आया है, जब मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने 5 नवंबर 2026 को पश्चिम बंगाल इन्वेस्टमेंट प्रमोशन पॉलिसी-2026 पेश की। सरकार का उद्देश्य राज्य में नए निवेश आकर्षित करना, औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ाना और रोजगार के अवसर पैदा करना है।
नई नीति में उद्योगों को प्रोत्साहन देने के साथ-साथ रोजगार सृजन को भी वित्तीय सहायता से जोड़ने की कोशिश की गई है। सरकार ने विशेष रूप से महिलाओं और ट्रांसजेंडर कर्मचारियों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया है।
नीति के तहत कुछ पात्र सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) में महिलाओं और ट्रांसजेंडर कर्मचारियों के लिए नियोक्ता के कर्मचारी भविष्य निधि (EPF) योगदान की 100 प्रतिशत तक प्रतिपूर्ति 10 वर्षों तक देने का प्रावधान घोषित किया गया है। पात्र सेवा इकाइयों में महिलाओं के रोजगार के लिए 75 प्रतिशत तक प्रतिपूर्ति की व्यवस्था भी बताई गई है।
इसके अतिरिक्त, प्राथमिकता वाले क्षेत्रों और चिन्हित औद्योगिक क्षेत्रों में निवेश करने वाली पात्र इकाइयों को संयंत्र और मशीनरी में किए गए योग्य स्थायी पूंजी निवेश के आधार पर अधिकतम 120 प्रतिशत तक वित्तीय सहायता देने का प्रावधान रखा गया है। यह सहायता निर्धारित शर्तों और सीमाओं के अधीन होगी।
सरकार ने उद्योगों के लिए जमीन उपलब्ध कराने, मंजूरियों की प्रक्रिया तेज करने और निवेशकों को सहायता देने के लिए GIS आधारित औद्योगिक भूमि सूची तथा ‘इंडस्ट्री बडी’ व्यवस्था की भी घोषणा की है।
जमीन और निवेश की पुरानी चुनौती
पश्चिम बंगाल में औद्योगिक विकास की चर्चा जमीन के सवाल के बिना पूरी नहीं होती। सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलनों ने राज्य की राजनीति और औद्योगिक नीति पर लंबे समय तक असर डाला है। वर्ष 2008 में सिंगूर में टाटा नैनो परियोजना को लेकर हुआ विवाद राज्य में उद्योगों के लिए भूमि अधिग्रहण का बड़ा राजनीतिक उदाहरण बन गया था।
नई नीति में सरकार ने सीधे जमीन खरीदने, लैंड पूलिंग के जरिए बड़े औद्योगिक भूखंड तैयार करने और सरकारी नियंत्रण वाली अनुपयोगी औद्योगिक जमीन को दोबारा इस्तेमाल में लाने की दिशा में कदम बढ़ाने की बात कही है।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, प्रस्तावित व्यवस्था में औद्योगिक जमीन मिलने के तीन वर्षों के भीतर उत्पादन शुरू करने की शर्त भी शामिल है। निर्धारित अवधि में काम शुरू नहीं होने की स्थिति में आवंटन रद्द करने पर विचार किया जा सकता है। हालांकि, जमीन खरीद और लैंड पूलिंग की विस्तृत प्रक्रिया तथा जमीन मालिकों के साथ समझौते की शर्तों को लेकर आगे और स्पष्टता अपेक्षित है।
उद्योगों को प्रोत्साहन बनाम सरकारी सहायता की राजनीति
पश्चिम बंगाल में औद्योगिक नीति का सवाल केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक बहस का भी हिस्सा रहा है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पिछली सरकार ने सामाजिक कल्याण योजनाओं और आम लोगों को आर्थिक सहायता देने पर विशेष जोर दिया था। दूसरी ओर, भाजपा सरकार ने सत्ता में आने के बाद उद्योगों को प्रोत्साहन, निवेश और रोजगार सृजन को अपनी आर्थिक प्राथमिकताओं में प्रमुखता दी है।
पिछली सरकार के कार्यकाल में औद्योगिक प्रोत्साहन योजनाओं को लेकर भी विवाद रहा। वर्ष 2025 में पारित कानून के जरिए 1993 से 2021 के बीच लागू कुछ औद्योगिक प्रोत्साहन योजनाओं और वित्तीय दायित्वों को पूर्वव्यापी प्रभाव से वापस लेने का फैसला किया गया था। इस फैसले से उद्योग जगत में बकाया प्रोत्साहन राशि और सरकारी नीतियों की निरंतरता को लेकर सवाल उठे।
नई नीति पेश करते हुए मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने निवेश और उद्योगों को बढ़ावा देने की प्रतिबद्धता जताई। वहीं, मुख्य सचिव मनोज अग्रवाल ने नीति को लागू करने के लिए सरकार की ओर से 30 हजार करोड़ रुपये की बचत किए जाने की बात कही।
मदन मित्रा के बयान का राजनीतिक महत्व
मदन मित्रा का बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह लंबे समय तक ममता बनर्जी के करीबी नेताओं में गिने जाते रहे हैं और राज्य सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। हालांकि, जुलाई 2026 में वह तृणमूल कांग्रेस के भीतर रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट के साथ चले गए थे और ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले संगठन में अपने पदों से इस्तीफा दे दिया था। वह कमरहाटी से विधायक बने हुए हैं।
ऐसे में भाजपा सरकार की औद्योगिक नीति को लेकर उनकी सकारात्मक टिप्पणी को केवल दलगत समर्थन के रूप में देखना उचित नहीं होगा। उनके बयान का बड़ा संदेश यह है कि राज्य के आर्थिक विकास के लिए उद्योग, निवेश और रोजगार को प्राथमिकता देने की जरूरत है।
हालांकि, किसी औद्योगिक नीति की वास्तविक सफलता उसके ऐलान से नहीं, बल्कि जमीन पर निवेश आने, उद्योग स्थापित होने, स्थानीय लोगों को रोजगार मिलने और सरकारी प्रोत्साहनों के प्रभावी क्रियान्वयन से तय होगी। पश्चिम बंगाल सरकार के सामने अब यही सबसे बड़ी चुनौती है।
गलती बताएँ
संबंधित खबरें
दिल्ली के प्रदूषण पर पंजाब के मंत्री का BJP से सवाल, केजरीवाल के पुराने बयान भी चर्चा में
दिल्ली की गफ्फार मार्केट में दुकानों में लगी आग, कई दुकानें जलकर हुई खाक
दिल्ली के चावड़ी बाज़ार हादसे के ज़िम्मेदार : तीन ठेकेदार गिरफ्तार
पाठकों की राय (0)
अभी कोई टिप्पणी नहीं। पहली राय आपकी हो सकती है।