यूरोप में युवा असंतोष और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर उठते सवाल
फ्रांस से पुर्तगाल और बेल्जियम तक युवाओं के विरोध प्रदर्शन यूरोप की आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों को सामने ला रहे हैं। महंगे घर, बढ़ता खर्च, शिक्षा और रोजगार की चिंता के बीच सरकारों पर सवाल उठ रहे हैं।
यूरोप महाद्वीप जिसने लोकतंत्र, नागरिक अधिकारों और स्वतंत्रता तथा सामाजिक न्याय को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, अगर वहीं आम जनसमूह विशेष कर युवा सड़क पर उतरकर अपनी मांगों के लिए विरोध प्रदर्शन करें तो वाकई यह एक विरोधाभास है। यह विरोधाभास उस व्यवस्था के सामने खड़ा है जिसने नागरिकों को बेहतर जीवन का भरोसा तो दिया लेकिन बदलती आर्थिक परिस्थितियों में उसी भरोसे को बनाए रखना उनके लिए चुनौती पूर्ण होता जा रहा है ।
फ्रांस, इटली, बेल्जियम, पुर्तगाल और अल्बानिया में युवाओं द्वारा हिंसक विरोध प्रदर्शन लगातार देखने को मिल रहे हैं । फ्रांस में आंदोलन की शुरुआत शिक्षा व्यवस्था में सुधार को लेकर शुरू हुआ लेकिन महंगाई, आवास संकट, और जीवन स्तर में गिरावट जैसे मुद्दों ने आंदोलन को व्यापक रूप दे दिया। वहीं इटली में महंगाई का मुख्य कारण आम जनसमूह द्वारा अपनी रोजमर्रा की जरूरत को पूरा करने में असमर्थता रही है। तो दूसरी ओर स्पेन में विरोध और हिंसापूर्ण कृत्य का प्रमुख कारण आसमान छूते घर के किराए, महंगाई और कम वेतन जैसे मुद्दे रहे हैं।
इसके अलावा सरकार पर बढ़ते दबाव के कारण समय से पहले आम चुनाव की घोषणा ने लोगों के अंदर की चिंगारी को भड़का दिया। सर्बिया में भ्रष्टाचार एवं अन्याय पूर्ण नीतियों के खिलाफ आंदोलन तो अल्बानिया में छात्र फीस वृद्धि एवं सरकारी नौकरियों में गिरावट तो बेल्जियम में विश्वविद्यालय शुल्क बढ़ोतरी ने हजारों छात्रों को सड़क पर उतरने को बाध्य किया। ये सभी समस्याएं केवल कानून व्यवस्था से न जुड़कर आर्थिक और सामाजिक कारणों से मूलरूप से जुड़ी हैं, जिन्होंने आम जनता को सड़क पर ला दिया है। इन विरोध और हिंसावादी प्रदर्शनों में आम जनता की अपेक्षाओं तथा सरकार की आर्थिक एवं सामाजिक सुरक्षा संबंधी नीतियों में गहरी खाई भी है।
हालांकि इन देशों की राजनीतिक परिस्थितियां अलग-अलग हैं लेकिन महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा, कम वेतन और सरकारी नीतियों के प्रति असंतोष जैसी समस्याएं समान हैं। आखिर ये विरोध क्यों हो रहे हैं इनके पक्ष में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ डॉक्टर हर्ष पंत बताते हैं कि दुनिया भर में इन विरोध प्रदर्शनों के प्रमुख कारण पहला आर्थिक असुरक्षा, दूसरा राजनीतिक अविश्वास जहां जनता यह विश्वास करती है कि सरकार आम जनता के बजाय शक्तिशाली लोगों के हितों को पूरा करने में लगी है और तीसरा इंटरनेट व सोशल मीडिया के दौर में सामूहिक लामबंदी आसान हुई है अतः आम जन समूह सामान्य मुद्दों पर सामान्य सहमति बनाने में पहले की तुलना में जल्दी सफल हो रहे हैं। वहीं अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ डॉक्टर आनंद कुमार का मानना है कि इजरायल-अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष से ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि ने परिवारों के बजट पर अतिरिक्त दबाव डाला है जिससे कमजोर आर्थिक विकास के कारण लोगों की आय आवश्यक खर्चों के अनुरूप नहीं बढ़ पा रही है।
यूरोप के युवा विरोध केवल "महंगाई के खिलाफ गुस्सा" नहीं है। यह एक पीढ़ी की असुरक्षा, अवसरों की कमी, रोजमर्रा के जीवन स्तर में गिरावट और लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की असंतुष्टि का परिणाम है । यदि सरकार इन विरोध प्रदर्शनों को संभालने के लिए केवल पुलिस और प्रशासन पर निर्भर रही तो यह अपने आप में पूर्ण नहीं है बल्कि इसके लिए सरकार को आम नागरिकों तथा युवाओं को नीति निर्माण में साझेदार बनाना होगा।
यूरोप में युवाओं का विरोध आर्थिक असमानता, सामाजिक असुरक्षा और राजनीतिक उपेक्षा का परिणाम है। सरकार को इन आंदोलन को सेना अथवा पुलिस प्रशासन की तैनाती के माध्यम से दबाने के बजाय नागरिकों के लिए किफायती आवास, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार सुरक्षा तथा गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक सेवाएं सुनिश्चित करनी होंगी।
Dr. Kumari Anupama,
Assistant Professor
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Yes mam aapne sahi kaha Europ ke desho or bharat me badte youth andolan less accountablity transparency welfare state ki kamiyo ke karan lagataar bad rahe hai jiske samadhan ke liye government ko yuvaon se baat karke system me relevant improvement ke dwara samadhan nikalne ki aavshyakta hai sath hi politics me youth representation digital delivrative democracy badake unke muddon ko uthaya ja sakta hai phir unko sadak par aana nahi padega.....